Monday, 2 November 2015

गीता पाठ-अठारहवाँ अध्याय

||श्री कृष्ण कृपा||
''अठारहवाँ अध्याय''
"मोक्षसंन्यासयोग"
पूजय महाराज श्री जी दवारा श्री मदभगवद गीता
जी के 'अठारहवें अध्याय "मोक्षसंन्यासयोग" की  सरल सुबोध पद्यानुवाद व्याखिया
  
अर्जुन उवाच 
बोला तब अर्जुन यूँ भगवान से,
हृषिकेश !अब यह बताओ मुझे |
हैं संन्यास और त्याग का तत्त्व जो,
अलग से इसे कैसे समझू प्रभु ||||

श्रीभगवानुवाच
कर्म छोड़ना कामना जिनमे हैं,
पंडित कई कहते संन्यास यह |
मगर छोड़ना फल की इच्छा को ही,
कहे इसको ही त्याग पंडित कई ||||

कहे कुछ कि हैं दोष कर्मो में जब,
तो हैं छोड़ने योग्य ये सब के सब |
विद्वान कुछ कहते हैं इतना ही,
के यज्ञ,दान तप को छोड़ो कभी ||||

अर्जुन ! मैं अब अपना निश्चय तुझे,
बताता हूँ इस त्याग के बारे में,
पुरुषों में श्रेष्ठ अर्जुन ! समझ,
इस त्याग के तीन प्रकार अब ||||

यज्ञ,दान,तप रूपी ये जो कर्म,
नही छोड़ने योग्य,करना धर्म |
यज्ञ,दान,तप के कर्म तीनो ही,
करे बुद्धिमानो को निर्मल यही ||||

कर्म तीनो ये और सभी कर्म जो,
ममता, फल इच्छा ही इनमे हो |
छोड़ो इनको मगर तुम कभी,
निश्चित हैं मत मेरा उत्तम यही ||||

कि जो काम निश्चित हैं तेरे लिये,
नही ठीक यह,तू उसे छोड़ दे |
मोह से अगर छोड़ देगा कहीं,
तो कहलायेगा त्याग तामस यही ||||

दुःख रूप जाने जो सब कर्मो को,
छोड़े उन्हें कष्ट के ड़र से जो |
तो त्याग उसका कहलाता हैं राजसी,
फल त्याग का मिलता उसको कभी ||||

अर्जुन ! फ़र्ज़ हैं कर्म करना ही,
समझ ऐसा जो कर्म करता सभी |
मगर त्याग आसक्ति फल का करे,
सतोगुण का ही त्याग कहते इसे ||||

अशुभ कर्मो से द्वेष जिसको नही,
हैं ममता शुभ कर्मो से भी कहीं |
हैं विद्वान,त्यागी व् ज्ञानी भी वह,
रहा उस को कोई भी संशय हैं ||१०||

देह धारियों से हो सम्भव कभी,
कि वे छोड़ पाये कर्म ही सभी |
मगर छोड़ देता हैं फल इच्छा जो,
कहलाता त्यागी असल में हैं वो ||११||

सकामी पुरुष छोड़ते देह को जब,
तो अच्छा बुरा मिश्रित फल पाये तब |
कर्म फल का करता मगर त्याग जो,
पाये कभी भी किसी फल को वो ||१२||

अब मुझ से अर्जुन ! समझ ले यह तू,
कारण तुझे पांच अब कहता हूँ |
कहे सांख्य सिद्धांत में जो गये,
हर कर्म में जिनसे सीधी मिले ||१३||

'आधार' हैं क्या कर्म करने का,
'कर्त्ता' हैं कौन और 'साधन' हैं क्या |
कई तरह कि 'चेष्टा' होती जो,
बिना 'भाग्य' सीधी भला कैसे हो ||१४||

    मन और वाणी या तन से ही जो,
कर्त्ता कर्म कोई कैसा भी हो |
विरुद्ध शास्त्र कि या अनुसार ही |
कारण कहे उसके पाँचो यही ||१५||

मगर ऐसा होते भी देखे जो यह,
कि बस आत्मा कर्मो का कर्त्ता हैं |
हैं अज्ञानी,बुद्धि अशुद्ध जिसकी हो,
नही इसिलिये देखता ठीक वो ||१६||

'मैं कर्त्ता हूँ' यह भाव जिसमे नही,
बुद्धि हो लिप्त जिसकी कहीं |
मारे अगर वह सभी लोको को,
हैं मारता और बंधन ही हो ||१७||

ज्ञेय,ज्ञान और ज्ञाता ये तीनो ही,
दे प्रेरणा कर्मो को करने की |
कर्त्ता,करण,कर्म तीनो हैं जो,
पूरा कर्म तो इन्ही से ही हो ||१८||

ज्ञान और कर्म कर्त्ता इन तीनो के,
हैं तीन प्रकार गुण-भेद से |
कहे साँख्य के शास्त्र में हैं जो,
भली-भाँति सुन मुझ से इन तीनो को ||१९||

नजर आते हैं जीव ये जो अनेक,
देखे जो समभाव से इनमें एक |
हैं अविनाशी परमात्मा सब में ही,
समझ सात्त्विक ज्ञान हैं बस वही ||२०||

   
  पुरुष देखता हैं यह जिस ज्ञान से,
सभी प्राणियों को अलग भाव में |
नज़र भिन्नता आये जब हर तरफ,
तो उस ज्ञान को ही तू राजस समझ ||२१||

जिस ज्ञान से देह में आसक्त हो,
समझता इसी को ही सब कुछ हैं जो |
युक्ति हैं और जिसमे तत्त्व ही,
तुच्छ ज्ञान ऐसा ही हैं तामसी ||२२||

हैं शास्त्र में कर्म जो नियत,
जो फल एच अभिमान से हैं रहित |
किया जो बिना राग और द्वेष के,
कर्म सात्त्विक ही हैं कहते इसे ||२३||

फल इच्छा रखकर किया जो कर्म,
लगा जिसमे हो खूब ही परिश्रम |
अहंकार में भर किया जाता जो,
कहते हैं राजस उसी कर्म को ||२४||

परिणाम हानि पे हो नज़र,
हिंसा व् शक्ति को देखकर |
मोह में कर्म जो शुरू हैं किया,
वही कर्म ही तो हैं तामस कहा ||२५|| 

अहंकार आसक्ति करता जो,
उत्साह धीरज भरा जिसमें हों |
हैं सिद्धि-असिद्धि बराबर जिसे,
कर्त्ता कहे सात्त्विक ही उसे ||२६||

रागी हैं जो फल को चाहें सदा,
हिंसा का स्वभाव,लालच भरा |
हर्ष शोक जिसमें,अशुद्ध भी हैं जो,
समझो कि हैं राजसी कर्त्ता वो ||२७||

चंचल,अशिक्षित घमंड हैं भरा,
जिद्दी,दुखी,चाहे सब का बुरा |
करे देह हर काम में आलसी,
कहा जाता हैं कर्त्ता वह तामसी ||२८||

अर्जुन ! गुणों के ही अनुसार अब,
बुद्धि,धृति के भी सुन भेद सब |
कहता तुझे हूँ में विस्तार से,
अलग भेद ये तीन प्रकार के ||२९||

कहाँ लगना,हटना कहाँ से मुझे,
करना, करना क्या मेरे लिये |
भय और अभय,बन्ध मुक्ति में भी,
करे भेद जो बुद्धि हैं सात्त्विकी ||३०||

नही जानता जिससे धर्म और अधर्म,
हैं क्या करने योग्य करना क्या कर्म |
अर्जुन ! समझ ऐसी बुद्धि हैं जो,
कहलाती हैं राजसी बुद्धि वो ||३१||

जिस अकल पर छाया अज्ञान हो,
समझे धर्म ही जो अधर्म को |
निकले अर्थ उल्टा हर बात का,
इसी बुद्धि को तामसी हैं कहा ||३२||

धृति,योग का लेती जो आसरा,
चाहे कुछ ईश्वर के सिवा |
क्रियायें मन,इन्द्रिय ,प्राणों की,
धारण करे जो,वही सात्त्विकी ||३३||

फल इच्छा रहती हैं जिसमे सदा,
धन,धर्म भोगों की हैं धारणा |
आसक्ति भी बहुत जिसमे भरी,
कहते उसे हैं धृति राजसी ||३४||

  पुरुष दुष्ट बुद्धि का जिससे कभी,
भय,चिंता,निद्रा को छोड़े नही |
दुःख और घमंड भी रहे साथ जब,
धृति ऐसी अर्जुन ! तू तामस समझ ||३५||

सुख के सभी तीन प्रकार जो,
अर्जुन ! मैं अब तुझसे कहता हूँ वो |
दुःख दूर हो जाते जिससे सभी,
अभ्यास से मिलता सुख हैं वही ||३६||

लगता शुरू में हैं विष के तरह,
परिणाम में होता अमृत ही वह |
मिले तब ही जब आत्मा का हो ध्यान,
वही सात्त्विक सुख हैं ऐसा तू जान ||३७||

आरम्भ में लगता अमृत हैं जो,
मगर बाद में वह ही विषरूप हो |
विषय इंद्रियों के मिले भोग से,
कहते रजोगुण का सुख हैं उसे ||३८||

आरम्भ परिणाम दोनों में जो,
करता हैं मोहित सदा जीव को ||
प्रमाद,आलस्य,निद्रा से ही,
मिले सुख जो कहलाता हैं तामसी ||३९||

गुण पैदा प्रकृति से जो हुए,
आजाद हैं कोई इन तीनो से |
पृथ्वी,स्वर्ग,देवों में भी कहीं,
ऐसा कोई भी तो प्राणी नहीं ||४०||

ब्राह्मण कोई भी या हो क्षत्रिय,
वैश्य भले ही हो या शूद्र भी |
स्वभाव से पैदा होते जो गुण,
वैसा ही इनका कर्म भेद सुन ||४१||

वश में हो तन-मन,क्षमा भाव हो,
मन शुद्ध,तप,सरल स्वभाव हो |
हो ज्ञान विज्ञानं,श्रद्धा भी जब,
ब्राह्मण के स्वाभाविक ये कर्म सब ||४२||

तेज़ और चतुरता,जो हैं शूरवीर,
भोगे युद्ध से कभी ऐसा धीर |
दान और शासन नियम से करे,
कर्म क्षत्रिय के हैं स्वभाव से ||४३||

खेती व् गोरक्षा व्यापर भी,
हैं वैश्य के ही कर्म ये सभी |
सेवा में सब के जो तत्पर रहे,
कर्म शूद्र का हैं यह स्वभाव से ||४४||

करते हुए अपने अपने कर्म,
पा लेता हैं जीव सिद्धि परम |
मिलती उसे सिद्धि जैसे हैं यह,
कहता हूँ तुझसे विधि अब मैं वह ||४५||

पैदा हुए जिससे हैं जीव सब,
समाया हैं जिससे यह सारा जगत |
उसे पूजकर अपने कर्मो से ही,
पा लेता इंसान सिद्धि तभी ||४६||

अच्छा भले ही हो परधर्म ही,
हैं बेहतर धर्म अपना गुण रहित भी |
करते हुए कर्म स्वभाव से,
नहीं पाप लगता कभी भी उसे ||४७||

हो अपने कर्म में अगर दोष ही,
फिर भी छोड़ो उसे तुम कभी |
सभी कर्मो में दोष वैसे ही हों,
अग्नि के संग धुँआ रहता हैं ज्यों ||४८||

बुद्धि में जिसकी हों ममता कहीं,
हैं काबू में मन,कोई इच्छा नहीं |
तो सिद्धि मिले सांख्य से उसको वो,
कर्मो का बंधन जहाँ पर हों ||४९||

मिल जाती उसको हैं सिद्धि यह जब,
तो पाता हैं वह ब्रह्म को जैसे तब |
समझ मुझ से अब सार में तू यही ,
जो हैं ज्ञान के निष्ठा उत्तम कहीं ||५०||

बुद्धि हैं शुद्ध जो प्रभु में लगे,
सयंम जो धीरज से अपना करे |
छोड़े जो शब्दादि विषियो को भी,
हों राग और द्वेष जिसमे कभी ||५१||

एकांत में रहता खाता हैं कम,
वश में हैं वाणी,शरीर और मन |
वैराग्य का लेता हैं आसरा,
रहे ध्यान में ही मग्न वो सदा ||५२||

अहंकार बल को जो देता हैं त्याग,
घमंड हैं, गुस्सा, इच्छा, राग |
संग्रह चाहे,सदा शांत जो,
प्रभु-प्राप्ति का हैं अधिकारी वो ||५३||

स्थिर हों के ब्रह्म में जो खुश हैं सदा |
चिंता कोई, रहे कामना |
समझे बराबर हैं सब जीव ही,
परा भक्ति मिलती उसे तब मेरी ||५४||

इसी भक्ति से जाने मुझ को वह तब,
मैं जो और जैसा हूँ वैसा ही सब |
मुझे तत्त्व से इस तरह जानकर,
मिल जाता मुझमे ही हैं ऐसा नर ||५५||

सभी कर्म करता रहे वह भले,
मगर आसरा मन से मेरा ही ले |
कृपा से मेरी ही पा लेगा वह,
परमपद सनातन जो अविनाशी हैं ||५६||

मुझे सौंप दे तू कर्म अपने सब,
मेरे परायण ही हों जा तू अब |
बुद्धि से समता का ले आसरा,
निरंतर तू मन अपना मुझमे लगा ||५७||

लगायेगा मुझ में ही मन को अगर,
सभी संकटो से तू जायेगा तर |
सुनेगा अहंकार से ये वचन,
तो हों जायेगा इससे तेरा पतन ||५८||

अहंकार में तू जो कहता यही,
लड़ाई मैं अब तू करूँगा नहीं |
मिथ्या तू अपना यह निश्चय समझ,
स्वभाव कर देगा तुझ को विवश ||५९||

अर्जुन ! तू वश में हुआ मोह के जो,
नहीं चाहता करना जिस कर्म को |
कर्म से बँधा पिछले स्वभाव के,
मजबूर होकर करेगा उसे ||६०||

प्राणी हैं अर्जुन ! यहाँ जितने भी,
रहे ईश्वर सब के हृदय में ही |
माया से अपनी सभी जीवो को,
चलाता हैं कर्मो के अनुसार वो ||६१||

अब तो भारत ! सर्वभाव से,
शरण तू उसी ईश्वर की ही ले |
कृपा से उसकी तू पा लेगा वो,
शांति,परमपद स्थायी हैं जो ||६२||

कहा मैने तुझसे हैं जो ज्ञान यह,
रहस्यों में उत्तम रहस्य हैं वह |
अच्छी तरह सोचकर इसपे ही,
कर वैसा जैसे हो इच्छा तेरी ||६३|| 

फिर वचन ऐसे तू सुन मुझ से वो,
रहस्य कोई जिनसे बढ़कर न हो |
अर्जुन ! बहुत प्यारा हैं तू मुझे,
कहता हु हित में तेरे इसीलिए ||६४||

हो भक्त मेरा लगा मुझमे मन,
कर पूजा मेरी, मुझे ही नमन |
तू प्यारा मेरा,पायेगा मुझको ही,
हैं प्रतिज्ञा सच्ची यह तुझसे मेरी ||६५||


आरोपित धर्म छोड़कर तू ये सब,
आ,एक मेरी ही ले शरण अब |
तुझे पापो से मुक्त कर दूँगा मैं,
चिंता न कर तू किसी भी तरह ||६६||

न हैं भक्त,तप भी नही करता जो,
करे निंदा,सुनने के इच्छा न हो |
रहस्य भरे जो ये उत्तम वचन,
कभी न करो इनसे ऐसे कथन ||६७||

रहस्य भरा ग्रन्थ गीता यह जो,
कहे प्रेम से जो मेरे भक्तो को |
पराभक्ति मुझ में ही रखते हुए,
संशय नहीं,पाता हैं वह मुझे ||६८||

करे ऐसी प्यारी जो सेवा महान,
नहीं दूसरा कोई उसके सामान |
कोई और इन्सां न इस लोक में,
प्यारा जो उससे हो बढ़कर मुझे ||६९|| 

धर्ममय यह संवाद हम दोनों का,
करे जो पुरुष पथ इसका सदा |
मत मेरे में पाठ उसका यही,
हैं ज्ञान-यज्ञ से ही पूजा मेरी ||७०||

सुने 'गीता -उपदेश' श्रद्धा से जो,
सुनते हुए दोष-दृष्टि हों |
मुक्त होक पापो से जाये वहाँ,
शुभ लोको में,कर्म पुण्य जहाँ ||७१||

अर्जुन ! जो यह ज्ञान तुझसे कहा,
सुना ध्यान से तूने इसको हैं क्या |
अज्ञान से पैदा मोह तेरा यह,
सुनकर ऐसे क्या हुआ नष्ट हैं ? ||७२||
  
अर्जुन उवाच 
प्रभु !मेरा मोह आपकी कृपा से.,
हुआ नष्ट,आई समझ अब मुझे |
संशय नहीं कोई अब तो रहा,
मानूँगा सब,आपने जो कहा ||७३||

संजय उवाच 
कहे जो वचन कृष्ण भगवान ने,
जो अर्जुन महा आत्मा ने सुने |
अद्भुत यह संवाद दोनों का सुन,
रोमांच में गया मेरा मन ||७४||

कृपा श्रीव्यास जी ने जो की,
रहस्य सुना गीता का यह तभी |
योगेश्वर कृष्ण भगवान से,
सुना मैने प्रत्यक्ष कहते हुए ||७५||

श्री-कृष्ण अर्जुन की संवाद वो,
अद्भुत हैं कल्याणकारी भी जो |
रह रह की करता हूँ उन पर विचार,
ख़ुशी से मैं झूम उठता हूँ बार-बार ||७६||

दिव्य श्री कृष्ण का रूप वो,
जिसे देखकर मन में हैरानी हों |
कर्त्ता हूँ जब जब भी उस पर विचार,
ख़ुशी से मैं झूम उठता हूँ बार-बार ||७७||

गीता का सुनो सार यह,ऐसा मेरा विचार हैं ,
योगेश्वर श्रीकृष्ण जो,अर्जुन सहित जहाँ भी हों
सम्पति सुख रहते वही,मिलती विजय हैं हर कहीं |
शक्ति धर्म नीति सभी,रहते हैं उसके पास ही ||७८||

तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे मोक्षसन्न्यासयोगो नामाष्टादशोऽध्यायः॥

हरी तत्सत ! हरी तत्सत ! हरी तत्सत !