Monday, 2 November 2015

गीता पाठ-ग्यारहवाँ अध्याय

||श्री कृष्ण कृपा||
''ग्यारहवाँ अध्याय''
"विश्वरूपदर्शनयोग"
पूजय महाराज श्री जी दवारा श्री मदभगवद गीता
जी के ग्यारहवाँ अध्याय "विश्वरूपदर्शनयोग" की  सरल सुबोध पद्यानुवाद व्याखिया

अर्जुन उवाच 
बोला तब अर्जुन यू भगवान से,
कृपा से अपनी वचन जो कहे |
रहस्य भरा तत्व अध्यात्म का,
जिसे सुन के नष्ट हो गया मोह मेरा ||||

अविनाशी प्रभाव जो आपका,
कमल नयन ! तुमसे ही मैने तुझसे |
उत्पति प्रलय भी सब जीवो की,
विस्तार से मैने तुमसे सुनी ||||

कहा आपने अपने को जैसा भी,
परमेश्वर ! ठीक हैं ऐसा ही |
भगवन ! हैं इतनी मेरी अब पुकार,
रूप आप का देख लूँ एक बार ||||

प्रभु ! मानते हो अगर आप ये,
में दर्शन का अधिकारी हूँ आपके |
तो योगेश्वर ! इतनी कृपा करो,
अविनाशी रूप अपना दिखला ही दो ||||

श्री भगवानुवाच 
तब अर्जुन से भगवान कहने लगे,
हजारो सैंकड़ो रूप अब मेरे |
दिव्य हैं ये रूप कई तरह के,
अनेको वर्ण और शक्लो वाले ||||

आदित्य बारह,वसु आठ देख,
ग्यारह रूद्र मरुत्त उनचास देख
कुमार अश्विनी और कई रूप जो,
नही देखे पहले तू अब देख वो ||||

गुडाकेश अर्जुन तू अब देख ले,
चाहता हैं जो भी वह सब देख ले |
नज़र आयेगा सब इसी तन में ही,
चर और अचर सारी दुनियाँ यही ||||

तू अर्जुन ! मगर बाहरी आँख से,
नही देख सकता कभी भी मुझे |
दृष्टि में दिव्य तुझे दूँगा अब,
स्वरूप इससे मेरा देख सब ||||

संजय उवाच 
यह देखकर अब यूँ संजय बोले,
राजन ! उसी वक़्त भगवान ने |
दिखलाया अर्जुन को स्वरूप वो,
ऐश्वर्य-प्रभाव से युक्त जो ||||

मुख थे अनेक और आँखे कई,
लगता अनोखा था दर्शन वहीं |
दिव्य आभूषण थे पहने हुए,
शस्त्र भी दैवी कई हाथ में ||१०||

मालायें वस्त्र अलौकिक सभी,
खुशबू भी दिव्य थी तन पे लगी |
बहुत रूपों वाला हैरानी भरा,
विश्वरूप ऐसा था भगवान का ||११||

निकलें जो सूरज हजार एक साथ,
जितना भी उन सबका हो प्रकाश |
मगर उसकी तुलना में शायद ही हो,
परम-आत्मा का हैं प्रकाश जो ||१२||

देखा तब अर्जुन ने इक ही जगह,
उसी वक़्त भगवान का रूप वह |
टिका जिसमे ही था यह सारा जगत,
मगर कोई भागो में था वह विभक्त्त ||१३||

यह स्वरूप भगवान का देखकर,
रोमांचित हुआ वह हैरानी में भर |
जोड़े हाथ प्रणाम भी तब किया,
अर्जुन !ने भगवान से यह कहा ||१४||

     अर्जुन उवाच 
नज़र रहे आपकी देह में
सभी देवता और समूह जीवो के
कमल आसन पर बैठे हैं ब्रह्मा जी,
शंकर ऋषि सर्प दैवी सभी ||१५||

अनेक हाथ,मुख,पैर और नेत्र भी,
कई रूपों में दिख रहे आप ही |
आदि मध्य अन्त आपके |
कठिन देखने में असीमित हैं जो,
दिखे ज्योति अग्नि व् सूरज सी वो ||१६ ||

गदा मुकुट चक्र को धारण किये,
चहुँ ओर प्रकाश तेज़ आपके |
कठिन देखने में असीमित हैं जो,
दिखे ज्योति अग्नि व् सूरज सी वो ||१७||
परम अक्षर तुम जानने योग्य हो,
सहारा तुम्हारा ही हैं विश्व को |
सनातन धर्म के हो रक्षक तुम्ही,
मानू तुम्हे पुरुष अविनाशी भी ||१८||

हैं आदि मध्य अन्त आपका,
भुजाये कई जिनमे बल हैं बड़ा |
सूरज चाँद आँखे तो मुख आग हैं,
तपाये जगत आपका तेज यह ||१९ ||

जगह हैं जो स्वर्ग और पृथ्वी में,
समाई दिशायें सभी आप से |
अलौकिक भयंकर जो हैं रूप ये,
त्रिलोकी काँपे इसे देख के ||२०||

सभी देवता मिल रहे आप में,
डरे हाथ जोड़े वे गुण गा रहे |
कल्याण हो ! कहते सिद्ध महर्षि,
करे स्तोत्रों से स्वसित वे आपकी ||२१||
वसु,रुद्र,आदित्य और साध्य भी,
मरुद्,विश्वदेव,पितर और अश्विनी |
असुर,यक्ष,गंधर्व सिद्ध ये सभी,
देखे तुम्हे हो के हैरान ही ||२२||

कई नेत्र,मुख,हाथ जँघा वाले,
कई पेट पाँव और भयानक दाढे |
प्रभु ! रूप ऐसा महा देख अब,
व्याकुल हूँ मैं लोक ये सब के सब ||२३||

कई रूप जो छू रहे हैं आकाश,
मुख फैला,आँखों में हैं प्रकाश |
यह देख आपका रूप डर मैं रहा,
शांति धैर्य ही मुझ में रहा ||२४||

मुख प्रलय अग्नि हैं दाढे विशाल,
नही जानता मैं दिशाओ का हाल |
शांति नही मिल रही अब मुझे,
प्रभु ! मुझ पे प्रसन्न हो जाइये ||२५||

भीष्म,द्रोण और ये कर्ण भी सभी,
योद्धा बढे अपनी सेना के भी |
धृतराष्ट्र पुत्र और समूह राजो के,
प्रवेश सब आप में कर रहे ||२६||

विकराल दाढ़े भयंकर हैं मुँह,
जाते हुए इन में लगता हैं यूँ |
फँसे दाँतो के बीच ऐसे हैं ये,
कई सिर सहित पिसते हैं जा रहे ||२७||

नदियों का जल जैसे बहता हुआ,
समुन्द्र में मिलने को दौड़े सदा |
प्रकाशित मुँह में प्रभु ! आपके,
यूँ प्रवेश योद्धा सभी कर रहे ||२८||
  नष्ट होने को ही पतंगे जैसे,
मिले आग जलती में तेज़ी से ये |
वैसे ही नाश अपना करने को अब,
मुँह में तुम्हारे हैं जा रहे सब ||२९||

सभी लोको का आप करके संहार,
सब और से चाटे मुँह बार-बार |
प्रकाश हैं आप का उग्र जो,
तपा रहा तेज़ अपने से दुनियाँ को ||३०||

प्रभु ! कौन है आप इस रूप में,
रूप उग्र कैसा जानू मैं ये |
नमस्कार तुम को,करो कृपा अब,
दिखाओ मुझे आदि रूप अपना सब ||३१||

श्रीभगवानुवाच 
करने को मैं नाश सब लोको का,
महकाल बन कर हूँ प्रगट हुआ |
लड़ने को तुमसे जो योद्धा खड़े,
रहेंगे ,युद्ध तू जो भी लड़े ||३२||

पाने को यश हे खड़ा हो तू अब,
इन्हे जीत, ले राज्य वैभव ये सब |
मरे गये पहले मुझ से सभी,
अर्जुन ! तू उठ बन निमित्तमात्र ही ||३३||

भीष्म ,द्रोण,जयद्रथ और कर्ण भी,
मर चुके बाकी भी योद्धा सभी |
डर तू अर्जुन ! इन्हे मार अब,
जीतेगा युद्ध में तू दुश्मन ये सब ||३४||

संजय उवाच 
भगवन केशव के सुन ये वचन,
जोड़े हाथ,डर काँप कर की नमन |
प्रणाम करके श्रीकृष्ण को,
बोला तब अर्जुन यूँ गद्गद्हो ||३५||

अर्जुन उवाच
प्रभु ! आपका कीर्तन कर के ही,
हैं हर्षित जगत पाये अनुराग भी |
असुर भागते डर के दिशाओ में,
उचित हैं,करे नमन सिद्ध सब तुम्हे ||३६||

ब्रह्मा के आदि बड़े सब से हो,
नमस्कार क्यों करे आपको |
सत और असत या परे इससे भी,
हो सब कुछ प्रभु ! आप बस आप ही ||३७||

आदि देव भगवन ! सनातन भी हो,
परमधाम सबको सहारा भी दो |
हो सर्वज्ञ तुम जानने योग्य भी,
समाया तुम्ही में जगत यह सभी ||३८||

यम,वायु,अग्नि,वरुण,चाँद तुम,
पिता ब्रह्मा के और हो ब्रह्मा भी तुम |
नमस्कार तुम को हजारो ही बार,
नमस्कार भगवन ! हैं फिर नमस्कार ||३९||

नमस्कार आगे व् पीछे से भी,
सब ओर से हैं नमस्कार ही |
तुम्ही में हैं सृष्टि यह साडी प्रभु,
सब कुछ सृष्टि के तुम ही तो हो ||४०||

माना प्रभु ! तुम को अपना सखा,
प्रभाव जाना कभी आप का |
प्रेम ओर प्रमाद में भर के ही,
कहा कुछ भी मैने हो तुम से कभी ||४१||

सोते,जागते,खाते,हँसते हुए,
अकेले किसी के भी या सामने |
अपमान मुझ से हैं कुछ भी हुआ,
भगवन ! क्षमा उसकी हूँ चाहता ||४२||

चराचर जगत के पिता हो तुम्ही,
गुरु गुरुओं के भी,हो पूज्य तुम्ही |
सम आपके कोई त्रिलोकी में,
बढ़ कर कोई कैसे हो आपसे ||४३||

चरणो में गिर करता प्रणाम हूँ,
कृपा करो मुझपे विनती करुँ |
पिता-पुत्र,सखा-मित्र,पति पत्नी को,
करे माफ़,वैसे ही मुझको करो ||४४||

हर्षित हूँ,मन भय से हैं काँपता,
कभी देखा रूप यह आपका |
मुझे रूप पहला ही दिखलाये,
हे देवेश ! प्रसन्न हो जाइये ||४५||


गदा, मुकुट और चक्र हो हाथ में,
रूप अपना ऐसा दिखाओ मुझे |
हजार 'हाथो' वाले विशवरूप अब,
चार हाथो के रूप में हो प्रगट ||४६||

श्रीभगवानुवाच 
परम तेजोमय आदि सबका हैं जो,
दिखाया तुझे रूप प्रसन्न हो |
सीमा रहित रूप यह मेरा ही,
किसी ने सिवा तेरे देखा नही ||४७||

वेदों के पढ़ने से दान से,
तप और यज्ञ के अनुष्ठान से |
विशवरूप मेरा यह इस लोक में,
देखा तेरे बिन किसी और ने ||४८||

मेरा रूप यह देख विकराल भी,
हो मूढ़ता और व्याकुलता ही |
भय छोड़कर अब तू प्रसन्न हो,
ले देख मेरे उसी रूप को ||४९||

संजय उवाच
तो भगवान ने कह के अर्जुन को यह,
दिखाया  चतुर्भुजी तब रूप वह |
श्रीकृष्ण ने रूप सौम्य दिखा,
भयभीत अर्जुन को धीरज दिया ||५०||

अर्जुन उवाच 
कहा तब यह अर्जुन ने भगवान से,
शांत आपका मानवी रूप ये |
हुआ शांंत मैं देख कर अब इसे,
टिका मन हैं अपने ही स्वभाव में ||५१||

श्रीभगवानुवाच
देखा जो तूने मेरा रूप यह,
दुर्लभ बहुत इस दर्शन ही हैं |
इसी रूप को देखने के लिये,
सदा देवता भी तरसते रहें ||५२||

वेदों से और ही तप से कभी,
यज्ञ से और कभी दान से ही |
सम्भव भला मेरा दर्शन हो कब,
जैसे मुझे देखा हैं तूने अब ||५३||

यकदिल हो जो मेरी भक्ति करे,
मैं जैसा हूँ वैसा मुझे जान ले |
सफल होता वह देखने में मुझे,
परतंप ! भक्त ऐसा मुझ में मिले ||५४||

जो मेरे लिये कर्म करता सभी,
हैं मेरे परायणं भक्त मेरा ही |
आसक्ति और कही वैर हैं,
पा लेता मुझको मेरा भक्त वह ||५५||

तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायांयोगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विश्वरूपदर्शनयोगो नामैकादशोऽध्यायः


हरी  तत्सत !हरी  तत्सत !हरी  तत्सत !

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