Monday, 2 November 2015

गीता पाठ-पहला अध्याय

||श्री कृष्ण कृपा||
''पहला अध्याय''
"अर्जुन विषादयोग
पूजय महाराज श्री जी दवारा श्री मदभगवद गीता
जी के प्रथम अध्याय "अर्जुन विषादयोग " की  सरल सुबोध पद्यानुवाद व्याखिया

धृतराष्ट्र उवाच
मिले जब धर्म भूमि कुरुक्षेत्र में ,
मेरे व् पाण्डु के सभी पुत्रो ने |
किया क्या बताओ संजय मुझे ,
कहा चिंता में भर के धृतराष्ट्र ने || ()

संजय उवाच
व्यूह रचना जो देखी पांडव सेना की ,
तो दुर्योधन में मची यह खलबली |
पहुंच कर निकट अपने आचार्य के ,
वचन दम्भ में भर कर उसने कहे ||||

आचार्य ! देखो जरा यह कमाल,
की व्यूह में खड़ी पांडव सेना विशाल |
शिष्य आपका धृष्टद्युम्न हैं जो ,
सेनापति बना इसका हैं वो ||||

खड़े सेना में बहादुर कई,
भीम और अर्जुन से जो कम नहीं |
महाबली विराट और सात्यकि,
द्रुपद को भी देखो जो हैं महारथी || ॥४॥

धृष्टकेतु पुरुजित् को देखो जरा,
इधर चेकितान भी डट कर खड़ा |
काशिराज बलवान् और कुंतिभोज,
नर श्रेष्ठ शैब्य का देखो ओज || ॥५॥

पराक्रमी वीर युधामन्यु,
सुभद्रापुत्र का पुत्र अभिमन्यु |
देखो उत्तमौजा योद्धा बलवान् ,
पुत्र द्रौपदी के सभी है महान || ॥६॥

पांडव सेना के मुख्य योद्धा दिखा,
तब दुर्योधन ने यह इशारा किया |
समझ लीजिये अब ब्राह्मण श्रेष्ठ,
सेना हमारी के जो वीर ज्येष्ठ ॥७॥

पितामह भीष्म और आचार्य आप ,
कर्ण जैसा भी योद्धा भी हैं अपने साथ |
विजयी कृपाचार्य,हैं विकर्ण भी ,
अश्वत्थामा और भूरिश्रवा सभी ॥८॥

खड़े जितने भी हैं कई शूरवीर ,
लिए शस्त्र लड़ने को हैं जो अधीर |
मेरे लिए जीने इच्छा की तज ,
निपुण युद्ध में ये बहादुर हैं सब ॥९॥

अजेय सेना अपनी हैं सब ओर से ,
हैं रक्षा में जिसके पितामह खड़े |
पांडव सेना हैं जितने में आसान ,
रक्षा में जिसकी हैं भीम बलवान ॥१०॥

तब दुर्योधन बोला महारथियों से ,
जगह अपनी अपनी पे हो कर खड़े |
पितामह भीष्म की रक्षा करो ,
चँहु ओर से नज़र उन पर धरो॥११॥

सुन कर वचन ऐसे दुर्योधन के ,
ख़ुशी उसमे उत्पन्न हो,तब इसीलिए |
पितामह भीष्म ने सिंह के सामान ,
ग़रज़ कर बजाया वो शंख महान ॥१२॥

ग़रज़ शंखो की तब चंहु ओर से,
इक साथ होने लगी जोर से ,
नृसिंघे नगारे ,मृदंग ,ढोल भी ,
भयंकर थी आवाज़ जिनकी बड़ी ॥१३॥

रथ ऐसा जिसमे अनोखा था तेज़,
सजे उसके आगे थे घोड़े सफ़ेद |
श्री कृष्ण-अर्जुन थे उसमे सवार ,
बजा शंख अपने हुए वे तैयार || १४ ||

शंख पांचजन्य हृषिकेश का ,
तो अर्जुन को 'देवदत' पर नाज था ||
दिखने लगा भीम भी अपना रंग ,
बजा कर वो भरी बहुत  'पौण्ड्र' शंख ||१५ ||

कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर का ,
'अनन्तविजयशंख भी बज उठा |
नकुल ने  सुघोष और सहदेव ने ,
बजाया 'मणिपुष्पक' उच्च स्वर  में || १६ ||


काशिराज  धनुष  श्रेष्ठ था जिसके पास ,
शिखण्डी महारथी ने दिया साथ |
पराकर्मी  महा धृष्टद्युम्न सभी |
विराट बली और अजेय सात्यकि || १७ ||

द्रुपद राजा और द्रौपदी सुत सभी ,
महाबाहु अभिमन्यु ने भी तभी |
शंख अपने बजाये सभी ने अलग ,
भरे जोश में थे महरथी सब || १८ ||

भयानक शब्द वहाँ हुआ यह जब ,
लगे गूंजने पृथ्वी आकाश तब |
धृतराष्ट्र पुत्रो के इस शब्द से,
उसी वक़्त ह्रदय थे फटने लगे ||१९ ||

शस्त्र थे तैयार चलने को जब ,
कपिध्वज अर्जुन ने भी उठकर तब |
खड़े देखकर वहा कौरव सभी ,
गाण्डीव अपना संभाला तभी || २० ||

अर्जुन उवाच
तत्पर हुआ युद्ध करने को वह ,
कहने लगा हृषीकेश से यह |
रथ को खड़ाकर दो भगवन ! वहां,
दोनों सेनाओ का मध्य जहां || २१ ||

खड़ा रखो रथ को वहां तब तलक ,
भली भांति मैं देख लूँ जब तलक |
आये कौन हैं लड़ने के इच्छा से ,
युद्ध में निपटना हैं जिनसे मुझे || २२ ||


उत्सुक हैं करने को युद्ध जो यहाँ ,
भला चाहे दुर्बुद्धि दुर्योधन का |
जरा देख तो लूँ उन्हें एक बार ,
कि हैं कौन से ऐसे राजा तैयार || २३ ||

संजय उवाच
गुडाकेश अर्जुन ने जब यह कहा ,
हृषीकेश ने दिया रथ को बढ़ा |
ले जाकर के मध्य में सेनाओं के ,
खड़ा कर दिया श्रेष्ठ रथ प्रभु ने ||२४ ||

पितामह और आचार्य के सामने ,
सभी राजागण भी जहां थे खड़े |
अर्जुन से भगवन बोले ये तब ,
इकठे खड़े देख कौरव ये सब ||२५ ||

खड़े थे वहां दोनों सेनाओं में ,
जी भर के अर्जुन ने देखा जिन्हे |
पितामह ,पिता, भाई ,बेटे,पोते ,
गुरु ,मित्र ,मामू ,सुहृद ,ससुर थे ||२६ ||

सबको वहां पर खड़ा देखकर ,
अर्जुन के मन में दया गई भर |
इच्छा से युद्ध के जो देखा इन्हे ,
दुखी हो के अर्जुन लगा कहने ||२७-२८ ||

अर्जुन उवाच
शिथिल हो रहे हैं मेरे अंग सब ,
सुखा जा रहा मेरा मुंह भी अब |
तन में होने लगी कंपकपी ,
खड़े हो रहे रोम रोम मेरे सभी ||२८-२९||

गाण्डीव भी अब तो हैं गिरने को ,
त्वचा भी मेरी जल रही हैं प्रभु |
भर्मित-सा हुआ जा रहा मन मेरा ,
खड़ा भी नही अब मैं रह पा रहा ||३०||

केशव ! हैं उल्टे शकुन भी सभी ,
लड़ाई में वध करके अपनों का ही |
कल्याण कोई भी हैं दीखता ,
करने में युद्ध अब मुझे तो जरा ||३१ ||

नही चाहता जीत मैं युद्ध में ,
सुख राज्य के भी नही चाहिये |
मतलब नही राज्य से ही कोई ,
भोगः और जीने के इच्छा रही ||३२ ||

सुख ऐश्वर्य सभी राज्य के ,
इच्छा थी इन सबकी जिनके लिए |
खड़े हैं वे सब छोड़ जीने के चाह ,
धन वैभव की हैं इन्हे परवाह || ३३ ||

देखो हमारे ये पूजय गुरु ,
पितमह ,चाची ,बेटे और ताऊ |
सेल,ससुर,पोते,मामू ये ,
खड़े हैं सम्बन्धी सभी अपने ||३४||

पृथ्वी के तो बात ही कुछ नही ,
मिले राज्य गर तीनो लोको का ही |
मधुसूदन! मरना भले ही पड़े ,
नहीं चाहता मारना मैं इन्हें ||३५ ||

धृतराष्ट्र पुत्रों का वधकर के ही ,
भगवन मिलेगी हमे क्या ख़ुशी |
हैं ये अत्याचारी भले ही मगर,
क्यों ले पाप हत्या का हम अपने सर || ३६ ||

नही योग्य हम मरने को इन्हें ,
सम्बन्धी सभी तो हैं ये अपने |
परिवार अपने का ही करके नाश ,
प्रभु ! कैसे रखे भला सुख के आस ||३७||

हुआ राज्य का लोभ ऐसा सवार,
करते नही अब ये इतना विचार |
की हैं दोष भारी जो हो कुल का नाश ,
विरोध अपने मित्रो का भी तो हैं पाप ||३८||

नही हम तो इस बात से अन्जान,
के कुलनाश का दोष कितना महान |
विचार ऐसा भगवन ! तब क्यों करे ,
कि जिससे हम इस पाप से बच सके || ३९ ||

कुल का जो हो जाये नाश अगर ,
रहेगा फिर धर्म का कुछ असर |
धर्म नष्ट होने से होगा यह हाल ,
फैलेगा कुल पैर अधर्म का जाल || ४० ||

अगर हो गया पाप इतना सवार ,
तो कुल स्त्रियो में बढे व्यभिचार |
हुई नारी जाती अगर ऐसी जो ,
तो उत्पन्न इसी से वर्ण संकर हो ||४१||

होगी वर्ण संकर संतान जो ,
तो कुल को ले ,जायेगी नरको में वो ,
गिरने लगेंगे पितर लोग भी ,
क्रिया होगी जो जल पिंड की ||४२||

कुल का ही जो नाश करते रहें ,
वर्ण संकर दोष वो पैदा करें |
नहीं रहती मर्यादा कुल धर्म की ,
नष्ट हो जाये जाती धर्म भी ||४३||

कुल धर्म हो जाता हैं जिसका नाश ,
बहुत कल तक होता नरको में वास |
प्रभु ! हम तो सुनते आये ऐसा ही ,
दशा ऐसे लोगो के होती यही ||४४||

बड़े खेद के बात हैं यह प्रभु ,
के तैयार हैं हम महापाप को |
हैं लालच यही राज्य का सुख मिले ,
कुल अपने का खून चाहे बहे ||४५||

ले शस्त्र हाथो में कौरव सभी ,
मुझे मारने को जो आये अभी |
उठाऊ शस्त्र ही युद्ध करुँ ,
समझता भला ऐसे मरने में हुँ ||४६||

संजय उवाच
निराश हो के जब उसने इतना कहा ,
तो मोह शोक में अर्जुन ऐसा बहा |
पिछले भाग में रथ के बैठा तभी ,
छोड़े धनुष-बाण अपने सभी ||४७||


तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादेऽर्जुनविषादयोगो नाम प्रथमोऽध्यायः
हरि तत्सत ! हरि तत्सत ! हरि तत्सत !

गीता तो सागर सामान ,मोती हैं जिसमे भरे |
गोता विरला ही लगाता ,भाग्य हैं जिसके जगे ||

No comments:

Post a Comment