||
श्री कृष्ण कृपा ||
''पंद्रहवाँ अध्याय''
"पुरुषोत्तमयोग"
पूजय महाराज श्री जी दवारा श्री मदभगवद गीता
जी के पंद्रहवे अध्याय "पुरुषोत्तमयोग"
की सरल सुबोध पद्यानुवाद व्याखिया
श्री भगवानुवाच
अविनाशी पीपल हैं संसार ये,
शाखाए नीचे हैं ऊपर जड़े |
पत्ते हैं इस वृक्ष के वेद ही,
इसे जाने जो वेद वेत्ता वही ||१||
गुणों से हैं शाखाए इसकी बढ़ी,
विषय भोगो से हैं जो सींची गई |
फैली हुई हैं ये चारो तरफ,
बंधे इससे कर्मो के अनुसार सब ||२||
नही रूप ऐसा दिखाई जो दे,
हैं आदि न अंत इसका और न टिके |
ढृढ़ शस्त्र वैराग्य का लेकर अब,
मजबूत इसकी जड़े काट सब ||३||
करो खोज परमेश्वर के तभी,
जिसे पा के आना न होता कभी |
सृष्टि रची जिसने कह ऐसा तू,
उसी ईश्वर के मैं अब शरण हूँ ||४||
मिटे मान मोह जीता संग दोष भी,
प्रभु में टिके,कामना न कोई |
न सुख दुःख के द्वन्द्व,ऐसा ज्ञानी हैं जो,
परमपद हैं अविनाशी पा लेता वो ||५||
प्रकाशित उसे कर न पाये कोई,
न सूरज,न चाँद और न अग्नि कभी |
जहाँ जा के फिर आना होता नही,
परम धाम कहलाता मेरा वही ||६||
जीवात्मा रहता इस तन में जो,
सनातन उसे अंश मेरा कहो |
जो मन इन्द्रियां उलझी माया में ही,
अपनी तरफ खींचे सब को यही ||७||
जीवात्मा छोड़े इस देह को जब,
नये तन में प्रवेश करता हैं तब |
तो मन-इन्द्रियाँ साथ ले जाये वो,
वायु ज्यो ले जाती हैं गंध को ||८||
लेकर के मन का सहारा ही ये,
कान,आँख,नाक और त्वचा जिह्वा से |
विषयो का सेवन करे यह वहाँ,
जिस देह में भी जाये जीवात्मा ||९||
किसी देह में जाये या देह छोड़े जो,
गुणों में रहे या विषय भोग़े वो |
अज्ञानी इसको भला जाने कब,
जो हैं ज्ञान चक्षु वही जाने सब ||१०||
यत्न करने वाले ही योगी हैं जो,
अनुभव करे आत्मा खुद में वो |
मगर शुद्ध नही जिनका अंतःकरण,
न अनुभव हो,चाहे करे वे यत्न ||११||
प्रकाशित करे जो सभी दुनिया को,
सूरज में ऐसा ही हैं तेज़ जो |
हैं चाँद और अग्नि में जो तेज़ भी,
समझ तेज़ इन सब में हैं मेरा ही ||१२||
पृथ्वी में प्रवेश करता हूँ जब,
तो धारण करुँ अपनी शक्ति से सब |
रस रूप बन चाँद ,भरता हूँ मैं,
शक्ति,वनस्पतियाँ जितनी भी हैं ||१३||
रहकर मैं ही देह में सब जीवो की,
बनता सभी की हूँ जठराग्नि |
प्राण और अपान बन की मैं ही सदा,
पचाता हूँ अन्न चारो प्रकार का ||१४||
हृद्य में सब की मुझे ही तू जान,
करुँ संशय नष्ट,मुझसे स्मृति-ज्ञान
|
जानने योग्य वेदों में,वेदांत भी,
मुझसे हैं,मैं वेद जानू सभी ||१५||
पुरुष दो प्रकार की हैं इस लोक में,
नाशी व् अविनाशी जो हैं कहे |
नश्वर ये प्राणी तू सारे समझ,
हैं अविनाशी जीवात्मा उनमे बस ||१६||
उत्तम पुरुष इनसे हैं दूसरा,
कहते उसे ही हैं परमात्मा |
हैं अविनाशी सबका वो पालन करे,
वही ईश्वर छाया त्रिलोकी में ||१७||
नाशी से मुझ को परे ही तू जान,
उत्तम हूँ अविनाशी से ऐसा मान |
सभी वेद और लोक भी इसीलिये,
कहते हैं पुरुषोंत्तम सब ही मुझे ||१८||
अर्जुन
! जो मोह छोड़ देता हैं सब,
पुरुषों में उत्तम मुझे जाने जब |
मुझे जानकर जान ले वह सभी,
भक्ति करे सब तरह से मेरी ||१९||
अर्जुन
! खा मेने तुझसे हैं जो,
रहस्य भरा शास्त्र ही हैं वो |
जो ज्ञानी इसे तत्व से जान ले,
करने को कुछ भी न रहता उसे ||२०||
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन संवादे पुरुषोत्तमयोगो नाम पञ्चदशोऽध्यायः
हरी ॐ तत्सत ! हरी ॐ तत्सत ! हरी ॐ तत्सत !
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