Monday, 2 November 2015

गीता पाठ-सातवाँ अध्याय

||श्री कृष्ण कृपा||
''सातवाँ अध्याय''
"ज्ञानविज्ञानयोग "
पूजय महाराज श्री जी दवारा श्री मदभगवद गीता
जी के सातवे अध्याय "ज्ञानविज्ञानयोग" की  सरल सुबोध पद्यानुवाद व्याखिया

श्री भगवानुवाच
मन जिसका आसक्त मुझ में हुआ,
परायण मेरे योग में जो लगा |
जैसे मुझे पूरा वो जान ले,
सुन मुझसे अर्जुन ! तू अब ध्यान से ||||

कहता हूँ अब में यह तेरे लिये,
विज्ञानं भी साथ ही ज्ञान के |
जिसे जानकर कुछ भी संसार में,
नही जानने योग्य बाकि रहे ||||

हजारों में होता कोई एक जो,
करता यत्न हैं मुझे पाने को |
यत्न करने वालो में भी हो कोई,
जो जान ले मुझको तत्व से ही ||||

अर्जुन ! समझ मेरी प्रकृति को,
बटी हैं इन्ही आठ भागों में जो |
पृथ्वी हैं जल तेज़ वायु आकाश,
अहंकार मन बुद्धि को ले के साथ ||||

प्रकृति जड़ हैं जो अपरा कही,
चेतन रूप  प्रकृति हैं दूसरी |
आधार इसको तू सबका समझ
धारण किया जिसने सारा जगत  ||||

जड़ और चेतन के संयोग से,
प्राणी सभी हैं ये पैदा हुए |
हूँ मूल कारण भी दुनियाँ का मैं,
उत्पत्ति संहार सब मुझसे हैं ||||

मेरे सिवा इस जगत में कही,
किंचित भी वस्तु धनंजय ! नही !
पिरोई हों धागे में मणियाँ जैसे,
संसार मुझ में गुँथा है वैसे ||||

मैं प्रकाश हूँ चाँद सूरज में ही,
सभी वेदो में मैं हूँ ऊँकार भी |
रस जल में, आकाश का मैं शब्द,
पुरुषत्व पुरुषों का मुझको समझ |||| 

खुशबू पवित्र हूँ मैं पृथ्वी की,
मुझसे ही हों तेज़ अग्नि का भी |
सभी जीवो का मैं ही जीवन बनू,
तप करने वालो का मैं तप हूँ ||||

मुझे जान अर्जुन ! तू सब जीवो का,
कारण अनादि रहे जो सदा |
मैं हूँ बुद्धिमानो की बुद्धि हैं जो,
तेजस्वी का तेज मुझसे ही हों ||१०||

बल मैं ही हूँ अर्जुन ! बलवानो का ,
नही जिसमे आसक्ति और कामना |
मैं इच्छा हूँ ऐसी सभी जीवो की,
धर्म की विरुद्ध जो होती कभी ||११||

सतोगुण,रजोगुण तमोगुण ये सब,
होते मुझी से तू ऐसा समझ |
मैं इनमे ये मुझमे ही हैं मगर,
होता नही मुझपे इनका असर ||१२||

गुणों से हुए भाव उत्पन्न हैं जो,
मोहित करे ये ही सब सृष्टि को |
अविनाशी हूँ मैं गुणों से परे,
ये प्रभाव मेरा नही जानते ||१३||

गुणों से हुई दैवी माया हैं ये,
मुश्किल बहुत पार करना इसे |
भजन मेरा करते सदा मगर जो,
संसार सागर से तर जाते वो ||१४||

माया ने हर लिया जिनका ज्ञान ,
स्वभाव हैं राक्षसो क़े समान |
पुरुष नीच ऐसे करे पाप ही,
भजन मेरा करते नही वे कभी ||१५||

धन चाहने वाला और जो दुखी,
जिज्ञासु सत्य का और ज्ञानी भी |
भक्त चार मेरे हैं अर्जुन ! यही,
उत्तम कर्म करने वाले सभी ||१६||

हैं ज्ञानी मगर श्रेष्ठ चारो में ही,
जो इक रूप हों करता भक्ति मेरी |
प्यारा मैं लगता बहुत ज्ञानी को,
मुझको भी उससे बहुत प्यार हों ||१७||

  अच्छे हैं बेशक भक्त ये सभी,
हैं ज्ञानी मगर मेरा स्वरूप ही |
रहता हैं मुझसे सदा एक वो,
उत्तम गति इससे बढ़कर हों ||१८|| 

बहुत जन्मो क़े अंत का जो जन्म,
ले ज्ञानवान उसमे मेरी शरण |
प्रभु क़े सिवा मानता जो कुछ,
महा-आत्मा ऐसा दुर्लभ बहुत ||१९||

इच्छाओ से ज्ञान जिनका ढका,
स्वभाव क़े वश में होकर सदा |
पूजा करे देवताओ क़े वो,
ढूंढे नियम अपने अनुसार जो ||२०||

रखकर कर क़े श्रद्धा कही भी कोई,
करना चाहे पूजा जिस देव की |
उसी देवता की लिये उसकी ही,
मैं मजबूत करता हूँ श्रद्धा वही ||२१||

उसी श्रद्धा से ही पुरुष ऐसा तब,
उसी देवता की करे पूजा अब |
पा लेता हैं फल मनोवांछित वह,
विधान उसका लेकिन मुझी से ही हैं ||२२||

जो मन्दबुद्धि पूजा करे देवो की,
फल उनको मिलता सदा नाशी ही |
देवो को पाये जो उनको भजें,
भक्त मेरे हैं जो वे पाये मुझे ||२३||

सर्वोत्तम अनश्वर परम भाव को,
बुद्धि रहित पुरुष जाने जो |
अव्यक्त हूँ मैं मगर माने वो,
मनुष्यो की भांति मेरा जन्म हों ||२४||

अवनाशी अजन्मा जाने मुझे,
जो है मूढ़ ऐसे मैं उनके लिये |
छिपा रहता हूँ योग माया से ही,
नही सामने उनके आताकभी ||२५||

सुन अर्जुन हुए हैं जो होंगे अभी,
नज़र रहे इस समय जो सभी |
इन सबको मैं जनता हूँ मगर,
ये सब की सब मुझ से हैं बेखबर ||२६||

करते सदा है जो शुभ कर्म ही,
नष्ट हों चुके पाप जिनके सभी |
द्वन्द्वो के मोह से हैं आजाद जो,
ढृढ़ निश्चय रख भजते मुझको वो ||२७||

राग और द्वेष से हैं पैदा जो ,
सुख-दुःख रूपी यही द्वन्द्व तो |
उलझा रहे सबको ज्ञान से ,
इन्ही में ही सब जीव मोहित हुए ||२८||  

बचने को मौत और बुढ़ापे से जो,
करते यत्न बस मेरी शरण हों |
ब्रह्म और सभी कर्म वे जानते,
अध्यात्म पूरा भी पहचानते ||२९||

अधिदैव अधियज्ञ सहित मुझको ही,
माने पुरुष जो अधिभूत भी |
लगा रहता चित्त जिनका मुझमे ही हैं,
अंतिम समय भी मुझे पता वह ||३०||
  
तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे ज्ञानविज्ञानयोगो नाम सप्तमोऽध्यायः 

हरि तत्सत ! हरि तत्सत ! हरि तत्सत!

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