Monday, 2 November 2015

गीता पाठ-छठा अध्याय


|| श्री कृष्ण कृपा ||
''छठा अध्याय''
"आत्मसंयमयोग"
पूजय महाराज श्री जी दवारा श्री मदभगवद गीता
जी के छठे अध्याय "आत्मसंयमयोग" की सरल सुबोध पद्यानुवाद व्याखिया

श्रीभगवानुवाच
इच्छा करे कर्म फल की जो,
करे कर्म जो करने योग्य ही हो |
हैं योगी भी और संन्यासी वही,
वह छोड़े जो आग क्रिया को ही ||||

अर्जुन जिसे कहते संन्यास लोग,
असल में समझ तू उसी को ही योग |
संकल्प छोड़े जब तक कोई,
योगी बन सकता हैं वह कभी ||||

हैं इच्छा जिसे योग में जमने की,
साधन हैं उसके लिए कर्म ही |
मगर योग में जब वो जाता है जम,
तो साधन हैं उसके लिए शान्त मन ||||

नही रहती भोगों में जब ममता ही,
आसक्ति होती हैं कर्मो से भी |
संकल्प सब छोड़ देता हैं जो ,
तो कहलाता हैं योग आरूढ़ वो |||||

उद्धार अपना करो आप  ही,
पतन में गिरने दो खुद को कभी |
कि हैं आप ही मित्र अपना भी यह,
नही और ,शत्रु भी खुद अपना हैं ||||

अपने को जिसने लिया आप जीत,
उसके लिए आप अपना यह मीत |
किया अपने को जिसने वश में नही,
दुश्मन हैं अपना तो वह आप ही ||||

सुख-दुःख हो सर्दी या गर्मी ही हो,
मिले मान अपमान हैं शान्त जो |
तन मन पे काबू जिसे हैं सदा,
प्रभु में ही ध्यान उसका हर दम लगा ||||

रहे ज्ञान-विज्ञान से तृप्त जो,
अविकारी,करे वश में सब अंगो को |
स्वर्ण-मिट्टी पत्थर को समझे समान,
योगी वही योग-आरूढ़ जान ||||

सुहृद्, मित्र, वैरी, उदासीन हो,
कि मध्यस्थ द्वेषी या बंधु हैं जो|
कोई साधु हैं या हैं पापी कोई,
हैं समबुद्धि सब में जो श्रेष्ठ वही ||||

संग्रह करे कभी भोगों का जो,
वश में हैं मन इच्छा कोई हो|
अकेला ही रहे योगी एकांत में,
स्थिर अपना मन वह प्रभु में करे ||१०||

रखकर कुशा घास शुद्ध भूमि पर,
बिछा मृग छाला तब रखे वस्त्र |
आसन लगाता हैं ऐसा ही वो,
ऊँचा निचा स्थिर ही जो हो ||११||

उस आसन पे ही बैठकर योगी वो,
करे वश में चित्त और सभी अंगो को |
निर्मल हो अंतःकरण इसलिए,
अभ्यास वह योग का अब करे ||१२||

सिर काया और गर्दन तीनो ही ये,
सीधा अचल इनको रखते हुए |
घुमाये दृष्टि कही भी कभी,
नज़र नाक की नोक पर हो जमी ||१३||

  रहे शान्त जो भय रहित भी सदा ,
मन वश हैं ब्रह्मचर्य व्रत में टिका |
सजग रह के मन अपना मुझ में लगाये,
लक्ष्य भी अपना मुझी को बनाये ||१४||

योगी वो मन जिसका अपने अधीन
करके सदा इसको मुझमे ही लीन |
शांति परम मुझसे पा लेता वो,
पाकर जिसे कुछ भी पाना हो ||१५||

जो खाये बहुत योग पा सके,
वह भी जो बिलकुल ही भूखा रहे |
सिद्ध योग उसका जो सोये अधिक,
सदा जागने से भी हो यह सिद्ध ||१६||

करता उचित जो आहार और विहार,
करे कर्मो में भी सही व्यवहार |
जागे वह और ही सोये बहुत,
तो हो योग से दूर सब उसके दुःख ||१७||

वश में हुआ चित्त जब जिस समय,
टिक जाये परमात्मा में ही यह |
किसी वस्तु की भी इच्छा रहे ,
उसी काल में कहते योगी उसे ||१८||

हवा पूरी तरह जहाँ बंध हो,
हिले वहाँ जलते दीपक की लौ |
जीता हैं मन जिसने वह योगी भी,
करे मन को स्थिर आत्मा में यूँ ही ||१९||

अभ्यास करते हुए योग का,
मन जिसका उपराम रहने लगा |
जहाँ देखता आत्मा अपने में,
हो संतुष्ट उसमे सदा की लिये||२०||
   हैं अक्षय आनंद इंद्रियों से परे,
शुद्ध बुद्धि ही इसको अनुभव करे |
जम जाये वृति जो इस सुख में ही,
विचलित हो तत्व से वह कभी ||२१||

प्रभु प्राप्ति रूप सुख पा के ही,
माने लाभ इससे बढ़कर कोई |
स्थित हो गया एक बार इसमे जो ,
बड़े भारी दुःख से भी विचलित हो ||२२||

जो दुखों का संयोग होने दे,
जानो उसे योग की नाम से |
इसी योग में रख के निश्चय ऐसा,
उकताओ ततपर रहो तुम सदा ||२३||

जड़ से ही इच्छाये तज कर सभी,
जो संकल्पो से ही हैं पैदा हुई |
सभी इंद्रियों को चहुँ ओर से,
मन के दवारा ही वश में करे ||२४||

धैर्य से बुद्धि को वश में करे,
उपराम हो सब से धीरे-धीरे |
मन अपने को आत्मा में लगा,
सोचे अब कुछ भी उसके सिवा ||२५||
चंचल हैं मन जो टिकता कही,
चिंतन करे यह तो विषयो का ही |
जहां जाये उससे हटाकर इसे,
परमात्मा में लगाता रहे ||२६||

नष्ट हो गए पाप जिसके सभी,
रजोगुण मिटा, मन हुआ शान्त भी |
योगी जो ऐसा हैं ब्रह्मरूप वो,
पाये वह सुख सबसे उत्तम हैं जो ||२७||

मुक्त पापों से ऐसा योगी सदा,
प्रभु में ही मन को लगाता हुआ |
प्रभु- प्राप्ति से मिले सहज जो,
अनुभव करे ऐसा सुख योगी वो ||२८||

समदृष्टि हैं जिसकी सब में बनी,
हैं योग में जिसकी वृति जमी |
देखे वह सब जीवो में अपने को,
सभी जीवो को देखे में अपने को||२९||

सभी में जो सत्ता मेरी देखता,
मुझी में ही सब जीव देखे सदा |
नही दूर रहता में उससे कभी,
रह पाये मुझ से वह दूर ही ||३०||

सभी प्राणियों में मुझे देखते,
योगी भजन जो मेरा ही करे |
व्यवहार करते हुए वह सभी,
रहता स्थित सदा मेरे में ही ||३१||

किसी का भी सुख हो या दुःख हो कभी,
समझता जो अर्जुन! उसे अपना ही |
सभी को ही देखे जो अपने समान,
परम श्रेष्ठ योगी उसी को तू जान ||३२||

अर्जुन उवाच 
वचन सुन ये अर्जुन लगा कहने,
कहा समता का योग जो आपने |
चंचल हैं मन में नही समझता,
की जम पाये यह योग में ही सदा ||३३||


श्रीकृष्ण ! मन हैं यह चंचल बड़ा,
हैं प्रमाथि बलवान हठ से भरा |
कठिन हैं बहुत करना वश में इसे,
आये वायु पकड़ में जैसे ||३४||

श्री भगवानुवाच
नही इसमे शक महाबाहो ! सुन,
चंचल हैं मन वश में करना कठिन |
लकिन यह अभ्यास वैराग्य से,
वश में हो जाये सदा की लिये ||३५||

वश में किया जिसने मन को नहीँ,
कठिन योग का पाना हैं उसको ही |
यत्न करके जो इसको वश में करे,
पा लेता वह योग, मत में मेरे |३६|| 

अर्जुन उवाच 
हैं श्रद्धा मगर लग्न पूरी नहीँ,
विचलित हुआ योग से जो कभी |
नहीँ पा सका योग में सिद्धि जो,
गति उसकी क्या हो यह भगवन ! कहो? ||३७||

कुछ जिसको संसार का आसरा,
प्रभु के भी पथ से जो विचलित हुआ |
हुआ दोनों में ओर से जो भ्रष्ट,
फटे बादल सम क्या वो हो जाता नष्ट? ||३८||

प्रभु ! पूरी तरह यह शंका मेरी,
मिटाने को बस योग्य हो आप ही |
नहीँ कोई दीखता सिवा आपके,
संशय मेरा दूर जो कर सके ||३९||
  
श्री भगवानुवाच 
तो भगवन बोले पुरुष ऐसा जो,
लोक और परलोक में नष्ट हो |
करता कर्म शुभ ही इंन्सा हैं जो,
नहीँ दुर्गति को कभी पाता वो ||४०||

हुआ भ्रष्ट हैं योग से जो कभी,
पाये वह फिर पुण्य लोको को ही |
बहुत वर्ष रह फिर जन्म ले वहाँ,
शुद्ध आचरण धनवान रहते जहां ||४१||

या फिर जन्म ऐसे घर में वो ले,
जहां प्रभु भक्त  और योगी रहे |
मगर जन्म ऐसा तो इस लोक में,
मुश्किल बहुत ही किसी को मिले ||४२||

जन्म ले के अर्जुन वहाँ पाये वो,
बुद्धि का संयोग पिछला हैं जो |
करे यत्न अब बढ़के पहले से ही,
दिखाता असर पिछला अभ्यास भी ||४३||

संस्कार पिछले दिखाते हैं जोर,
खिंच जाता हैं मन प्रभु की ओर |
कहे वेदों में जो कर्म हैं सकाम,
देता जिज्ञासु  उन पर ध्यान ||४४||

योगी यत्न से जो इसमे लगे,
सभी पाप हैं जिसके नष्ट हो चुके |
बहुत जन्म लग की हुआ शुद्ध जो,
गति परम पा लेता हैं योगी वो ||४५||

योगी तपस्वी से भी श्रेष्ठ हैं,
कहलाये ज्ञानी से भी बढ़के वह |
कर्मकाण्डी से समझ बेहतर उसे,
अर्जुन ! तू भी योगी बन इसलिये ||४६||

सभी योगियों में हैं श्रद्धालु जो ,
करे मुझ में ही लीन मन अपना वो |
भजन जो करे हर समय मेरा ही ,
मत मेरे में श्रेष्ठ योगी वही ||४७||

तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे आत्मसंयमयोगो नाम षष्ठोऽध्यायः
हरि तत्सत ! हरि तत्सत ! हरि तत्सत!


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