Monday, 2 November 2015

गीता पाठ-तीसरा अध्याय


|| श्री कृष्ण कृपा ||
''तीसरा अध्याय''
"कर्मयोग"
पूजय महाराज श्री जी दवारा श्री मदभगवद गीता
जी के तीसरे अध्याय "कर्मयोग" की  सरल सुबोध पद्यानुवाद व्याखिया

अर्जुन उवाच 
कहा सुन के अर्जुन ने यह बात तब,
के हैं श्रेष्ठ कर्मो से ही ज्ञान जब |
प्रभु ! इसमे मुझको लगाते हो क्यों,
कर्म युद्ध रूपी भयंकर हैं जो ||||

सुन कर ये मिश्रित वचन आपके,
नही समझ कुछ रहा अब मुझे |
बात एक निश्चित ही मुझसे कहो,
जिसमे प्रभु ! मेरा कल्याण हो ||||

श्री भगवानुवाच 
तब अर्जुन से भगवान कहने लगे,
हैं दो तरह के निष्ठा इस लोक में |
लगे ज्ञान में पुरुष ज्ञानी हैं जो ,
हो निष्ठा कर्म योग में योगी को ||||

कर्म छोड़ देने से कोई कभी ,
मुक्त हो सके कर्म बंधन से ही |
यह संभव नही की कर्म त्याग से ,
परम पद कोई भी कभी पा सके ||||

अर्जुन! बिना कर्म क्षण भर को भी ,
नही रह सकता कोई भी कभी |
पैदा प्रकृति से गुण तीनो जो,
मजबूर करते कर्म करने को ||||

हठ से जो रोके सभी इंद्रिया,
मगर मन में रहता हैं चिंतन बना |
समझ मूढ़ बुद्धि पुरुष ऐसा ही,
कहलाता अर्जुन ! हैं दम्भी वही ||||

मन से जो करता हैं वश अपने अंग,
रहकर सदा ही सभी से असंग |
करम योग का करता आचरण जो,
सुन अर्जुन ! कर्मयोगी हैं श्रेष्ठ वो ||||

कर्म कर नियत तू समझ अपना धर्म,
कर्म त्याग से श्रेष्ठ करना हैं कर्म |
करेगा अगर तू कर्मो को ही,
चल पायेगा तब यह तन तेरा भी ||||

यज्ञ के सिवा करते हैं कर्म जो,
तो बंधन में पड़ जाते कर्मो के वो |
करके रहित मन को आसक्ति से ,
तू कर कर्म अर्जुन ! प्रभु के लिए ||||

रचना की ब्रह्मा ने प्रजा की जब,
तो यज्ञ को भी पैदा किया साथ तब |
यज्ञ से करो उन्नति यह कहा,
जो चाहोगे इससे मिलेगा सदा||१०||

देवो को उन्नत करो यज्ञ से ,
करेंगे तभी उन्नत तुम को भी वे |
जो आपस में करते रहो ऐसा ही,
परम पदको प् जाओगे तुम तभी ||११||

खुश होंगे जब देवता यज्ञ से ,
तो देंगे तुम्हे फल मनोवांछित वे |
बने स्वार्थी उनसे ले भोग जो,
समझो यह निश्चित की हैं चोर वो ||१२||

बचा यज्ञ का अन्न खाते हैं जो ,
तो हो जाते हैं मुक्त पापो से वो |
पकाये जो अपने ही तन की लिये,
हैं पापी सदा खाते हैं पाप वे ||१३||

पैदा हो ये जीव अन्न से सभी,
अन्न पैदा होता हैं वर्षा से ही |
वर्षा हो तब होता हैं यज्ञ जो,
करते हैं उत्पन्न कर्म यज्ञ को ||१४||

उत्पति हो वेद से कर्मो की,
प्रगट हुये वेद ब्रह्म से सभी |
तभी तो सर्वव्यापी परमात्मा,
रहता हैं मौजूद यज्ञ में सदा ||१५||

चक्र सृष्टि का नियमो में चल रहा,
जो अनुसार इसके नही वर्त्तता |
रमण करता हैं इंद्रियों में ही जो,
जीता व्यर्थ में ही पापी हैं वो ||१६||

मगर आत्मा से ही प्रीति जिसे ,
सदा तृप्त जो आत्मा से रहे |
सन्तुष्ट रहता हैं अपने में ही ,
कर्तव्य उसके लिए कोई ||१७||

कर्म करने से कुछ मतलब उसे,
प्रयोजन ही कर्म करने से |
किसी जीव की साथ भी तो नही ,
स्वार्थ का सम्बन्ध उसका कही ||१८||

करो कर्म हो के असङ्गः इसलिये,
कर्म करने योग्य जो हैं कर उसे |
कर्म करने में राग जिसका हो,
पा लेता हैं वह परम पुरुष को ||१९||

जनक आदि ज्ञानी हुए जितने भी ,
पा गये सिद्धि वो कर्मो से ही |
ऐसे ही अर्जुन ! कर्म तू भी कर,
लोगो के हित पर ही रख कर नजर ||२०||

जो आचरण करता पुरुष श्रेष्ठ ही,
उसे देख कर बरतते हैं सभी |
प्रमाण जो भी वह कर देता हैं ,
बन जाता आदर्श लोगो का वह ||२१||

त्रिलोकी से काम मुझको कोई,
अप्राप्त वस्तु नही ऐसी भी |
कि पाने के इच्छा हो जिसकी मुझे ,
फिर भी लगा रहता हु कर्मो में ||२२||

अगर ऐसा हो जाये अर्जुन! कही ,
सजगता में कर्मो में वर्तु नही |
सभी लोग करने लगे वैसा ही,
अनुसार चलते हैं मेरे सभी ||२३||

कर्म छोड़ बैठूँ अगर मैं ही सब,
तो हो जायेगा पतन लोगो का तब |
बनूँगा मैं कारण वर्ण संकर का ,
प्रजा का नाश इससे हो जायेगा ||२४||

होकर के आसक्त कर्मो में जो ,
करता कर्म जैसे अज्ञानी हो |
करे कर्म विद्वान भी वैसे ही ,
हो दृष्टि मगर लोक कल्याण की ||२५||

रखकर आसक्ति जो करता कर्म,
पैदा करे ज्ञानी उसमे भ्रम |
करे कर्म उत्तम वह इस ढंग से ,
असर जिनका उसपे स्वयं ही पढ़े ||२६||

अर्जुन! हैं जितने कर्म ये सभी ,
किये जा रहे हैं गुणों दवारा ही |
अहंकार से जो मोहित हुआ,
'मैं करने वाला हूँ' माने सदा ||२७||

मगर जान लेता हैं जो इनका मर्म,
के हैं वास्तव में क्या गुण और कर्म |
गुणों में ही गुण बरतते हैं सभी,
जाने जो यह हो मोहित कभी ||२८||

मोहित गुणों से ही जो हैं हुए,
वे आसक्त कर्मो गुणों में रहे |
हैं मुर्ख नही ठीक उनकी समझ,
विचलित करे उनको ज्ञानी पुरुष ||२९||

चित्त अपने को ध्यान में जोड़कर ,
सभी कर्मो को मुझपे ही छोड़कर |
रख आशा और ही ममता कही ,
तू कर युद्ध अब छोड़ संताप भी ||३०||

श्रद्धा सहित ,दोष देखे बिना,
चले जो सदा ऐसे,जैसे कहा |
पुरुष ऐसे ही कर्मो के जाल से,
पा लेते मुक्ति सदा के लिये ||३१||

वो मुर्ख हैं जो दोष दृष्टि करें,
नियम के मुताबिक कभी चले |
अर्जुन ! व्यर्थ उनका हैं सारा ज्ञान ,
बुद्धि रहित ऐसो को नष्ट जान ||३२||

हैं स्वभाव जैसा किसी पुरुष का ,
करे कर्म उसके ही वश हो सदा |
कर्म करता ज्ञानी भी होकर विवश,
किसी और का फिर चले कई हठ||३३||

भोग इन्द्रियों के हैं जितने भी ये ,
सदा राग और द्वेष उनमे रहे |
वश में होना तुम इनके कभी ,
हैं कल्याण मार्ग के दुश्मन यही ||३४||

लगे अच्छा तुझको जो पर धर्म ही,
के बेहतर हैं धर्म अपना गुण सहित भी |
स्वधर्म में मरणा भी अच्छा हैं,
पर धर्म में तो सदा रहता भय ||३५||

अर्जुन उवाच 
पूछा तब अर्जुनने भगवन ! कहो,
हैं क्या ऐसी ताकत वो जिससे प्रभु |
करता हैं पाप इन्सां मजबूर हो,
नही चाहता फिर भी करवा ले जो ||३६||

श्री भगवानुवाच 
तो भगवान बोले रजोगुण हैं जो ,
यह पैदा करे काम और क्रोध को |
बहुत खाने वाला हैं पापी बड़ा,
वैरी समझ इसको तू अपना ||३७||

धुएँ से ज्यो आग दिखती नही,
ढक ले ज्यो शीशे को भी मैल ही|
छिपा रहता गर्भ झिल्ली में ज्यो,
ढके वैसे ही कामना ज्ञान को ||३८||

समझ कामना आग ही की तरह,
नही तृप्त होती कभी भी तो यह |
सदा वैरी इसको तू ज्ञानी का जान,
अर्जुन! ढका जिससे इन्सां का ज्ञान ||३९||

मन ,बुद्धि और इंद्रिया ये सभी,
रहे कामना सदा तीनो में ही |
इन्ही से यह ढक लेती हैं ज्ञान को ,
जीवात्मा इससे ही मोहित हो ||४०||

भरतश्रेस्ठ अर्जुन! समझ ले यह अब,
कर वश में पहले तू अंग अपने सब |
खत्म कामना कर जो पापी महान,
करे नष्ट जो ज्ञान और विज्ञानं ||४१||

तन से पर हैं सभी इंद्रिया,
मन को मगर श्रेष्ठ इनसे कहा |
मन से परे बुद्धि होती सदा,
बुद्धि से भी श्रेष्ठ हैं आत्मा ||४२||

समझ कर महाबाहो ! तू बात यह ,
की बुद्धि  से भी आत्मा श्रेष्ठ हैं |
वश कर तू बुद्धि से मन अपना ,
कर नाश,वैरी हैं यह कामना ||४३||

तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मयोगो नाम तृतीयोऽध्यायः
हरि तत्सत ! हरि तत्सत ! हरि तत्सत

कर्मयोगी बनो ,
कर्म भोगी नही |

समर्पण भाव से करम करो |
जो हुआ ,जो हो रहा हैं ,होगा
मेरे पुरुषार्थ से नही
ईश्वरीय शक्ति से..

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