||श्री कृष्ण कृपा||
''सोलहवाँ अध्याय ''
"दैवासुरसम्पद्विभागयोग"
पूजय महाराज श्री जी दवारा श्री मदभगवद गीता
जी के सोहलवें अध्याय " दैवासुरसम्पद्विभागयोग
" की सरल सुबोध पद्यानुवाद व्याखिया
श्री भगवानुवाच
भय से रहित,शुद्ध अंतःकरण,
जमे ज्ञान में अच्छी प्रकार से मन |
दम,दान,यज्ञ और पठन ग्रंथो का,
तप करना,स्वभाव में सरलता ||१||
अहिंसा हो,सच्चाई,गुस्सा न हो,
मन शांत और छोड़े अभिमान को |
न चुगली,न लालच,न चंचलता ही,
दया भाव,लज़्ज़ा,हैं कोमलता भी ||२||
क्षमा,तेज़,शुद्धि हैं और धैर्यवान,
किसी का न वैरी,न चाहे जो मान |
ऊपर कहे गुण हैं ये जितने भी,
कहते उसे सम्पदा हैं दैवी ||३||
अभिमान जिसमे,करे जो पाखंड,
क्रोधी हैं रखता जो मन में घमंड |
वाणी कठोर और अज्ञानता,
पुरुष आसुरी के हैं यह सम्पदा ||४||
करे जीव को मुक्त गुण दैवी ही,
बंधन में ले जाते हैं आसुरी |
मिली हैं तुझे सम्पदा दैवी ये,
अर्जुन
! न कर शोक तू इसिलिये ||५||
हैं संसार में जीव दो तरह के,
दैवी हैं कुछ,आसुरी कुछ कहे |
स्वभाव देवो का तुझ से कहा,
विस्तार सुन मुझ से अब असुरो का ||६||
न इतना भी जाने पुरुष आसुरी,
की करना हैं क्या और क्या करना नही |
न शुद्धि,न ही श्रेष्ठ आचरण हो,
सच्चाई से काम लेते न वो ||७||
संसार को झूठा कहते हैं वे,
न आधार कोई,बिना ईश के |
हो आपस के संयोग से ही पैदा,
सिवा काम के और कारण हैं क्या ||८||
दृष्टि बनी नास्तिक ऐसी जो,
हुआ नष्ट स्वभाव,कम अक्ल वो |
करने को नुक्सान,भयंकर कर्म,
संसार में लेते हैं वे जन्म ||९||
करे कामनायें जो पूरी न हों,
दम्भ मान मद में रहे चूर जो |
नियम झूठे उनके,हैं अज्ञानी वे,
रहे जगत में भ्रष्ट आचरण से ||१०||
अनगणित चिंतायें रहती उन्हें,
मरने तलक उलझे इनमे रहे |
लगे रहते हर वकत विषियो में ही,
माने की सब कुछ यही हैं यही ||११||
आशाओ की फाँसियों में बंधे,
परायण हुए काम और क्रोध के |
भोगो को ही भोग़ने के लिये,
करे धन इक्टठा वे अन्याय से ||१२||
पाया हैं इतना तो बस आज ही,
हों जायेगी पूरी यह इच्छा भी |
धन इतना तो हों गया अपने पास,
होगा अभी और रखे वे आस ||१३||
मारा गया मुझ से दुश्मन हैं वो,
मारूंगा अब में सभी औरों को |
ईश्वर हूँ, ऐश्वर्य भोगू सभी,
बलवान सिद्ध रहता हूँ मैं सुखी ||१४||
कुटुम्बी हूँ मैं बहुत धनवान भी,
बराबर मेरे दूसरा न कोई |
मौजे करूँगा मैं यज्ञ दान से,
मोहित रहे ऐसे अज्ञान से ||१५||
मन जिनका ऐसा हैं भटका हुआ,
फंसे रहते मोह जाल में ही सदा |
विषियो में आसक्त रहते हैं जो ,
गिरते भयंकर ही नरकों में वो ||१६||
अपने को मने वे सबसे बड़ा,
घमंड उनमे धन,मान,मद का भरा |
हैं दम्भी करे यज्ञ दिखावे को ही,
होती न उसमे विधि शास्त्र की ||१७||
अहंकार,बल और घमंड से भरे,
इच्छायें और क्रोध भी जो करें |
अपने में,औरों की देह में भी जो,
रहूँ मैं,करें द्वेष मुझसे भी वो ||१८||
हैं द्वेषी,लगे पाप कर्मो में भी,
जालिम हैं ऐसे पुरुष नीच ही |
बारम्बार ऐसो को इस लोक में,
असुर योनियों में गिराता हूँ मैं ||१९||
ये मुर्ख हैं पाये न मुझको कभी,
रहे जन्मो तक असुर योनि में ही |
फिर उससे भी बढ़कर गति नीच हो,
भयंकर नरक में ही पड़ते हैं वो ||२०||
नरक की कहे हैं ये तीनो ही द्वार,
हो काम और क्रोध, लालच सवार |
पतन करने वालो हैं ये जीव का,
इन तीनो से बच की रहना सदा ||२१||
नरक के जो इन तीनो ही द्वारो से,
मुक्त हो गया हैं सदा के लिये |
कल्याण का करता आचरण जो,
गति परम अर्जुन ! हैं पा लेता वो ||२२||
न पालन करें शास्त्र के विधि,
करते जो आचरण मनमाना ही |
न सिद्धि मिले और न सुख ही कही,
गति परम भी प् वे सकते नही ||२३||
प्रमाण हैं शास्त्र इसीलिये,
करे भेद जो करने न करने में |
यही जानकर ही कर्म अब तू कर,
कहे जो भी जैसा,तुझे शास्त्र ||२४||
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्नीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन दैवासुरसम्पद्विभागयोगो नाम षोडशोऽध्यायः
हरि ॐ तत्सत ! हरि ॐ तत्सत ! हरि ॐ तत्सत !

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