Monday, 2 November 2015

गीता पाठ-चौदहवाँ अध्याय

||श्री कृष्ण कृपा||
''गुणत्रयविभागयोग''
"चौदहवाँ अध्याय"
पूजय महाराज श्री जी दवारा श्री मदभगवद गीता
जी के चौदहवे अध्याय "गुणत्रयविभागयोग" की  सरल सुबोध पद्यानुवाद व्याखिया

श्रीभगवानुवाच 
कहता हूँ तेरे लिये फिर मैं अब,
ज्ञानो में उत्तम जो हैं ज्ञान सब |
जिसे जानकर ही मुनिजन सभी,
हुए मुक्त पाई परम सिद्धि भी ||||

इसी ज्ञान का आसरा लेते जो,
स्वरूप में मेरे मिल जाते वो |
पैदा हो वे तब जो सृष्टि बने,
प्रलय हो जब तो दुःख हो उन्हें ||||

हैं माया मेरी योनि सब जीवो की,
स्थापित करुँ बीज मैं स्वयं ही |
अर्जुन ! इसी की ही संयोग से,
प्राणी सभी पैदा होते हैं ये ||||

अनेको किस्म की ये कई योनियाँ,
इन सब में हो जीव जो भी पैदा |
प्रकृति इन सब की माता कही,
पिता बन की डालू मैं बीज आप ही ||||

पैदा हुए गुण ये माया से ही,
सतोगुण,रजोगुण,तमोगुण सभी |
देह में जो अविनाशी जीवात्मा,
अर्जुन ! ये गुण बाँधे उसको वहाँ ||||

सतोगुण तो निर्मल हैं स्वभाव से,
विकारों रहित प्रकाश ये |
ज्ञान और सुख की हैं आसक्ति जो,
बाँधे उसी से ही यह देही को ||||

रजोगुण समझ राग का रूप ही,
करें पैदा मोह कामना को यही |
अर्जुन ! यह कर्मो की आसक्ति से,
देहधारी को उसमे ही बाँध ले ||||
  तमोगुण जो सब को ही मोहित करें,
होता हैं उत्पन्न यह अज्ञान से |
आलस्य,प्रमाद निद्रा हैं जो,
इन्ही से सदा बाँधे यह जीव को ||||


सतोगुण लगाता हैं सुख में सदा,
रजोगुण तो कर्मो में देता लगा |
तमोगुण मगर ज्ञान हर लेता हैं,
लगाता हैं प्रमाद में सबको यह ||||

अर्जुन ! सतोगुण तो बढ़ता हैं तब,
रजो और तमो दोनों ही जाये दब |
बढ़ता तमोगुण जो सत रज दबे,
दबा तम व् सत को रजोगुण बढे ||१०||

देह की सभी द्वारो में जब कभी,
प्रकाश हो जाये सब ओर ही |
पैदा हो जब जिस वक्त उसमे ज्ञान,
बढ़ा हैं सतोगुण तभी यह तू जान ||११||

बढे जब रजोगुण तब अर्जुन ! तू सुन,
स्वार्थ में भर लगती कर्मो की धुन |
हो लोभ,इच्छा,अशांति भी तब,
पैदा हो ये वृत्तियाँ सब की सब ||१२||

होते जो परमध ओर मोह सवार,
छा जाये अज्ञान का अंधकार |
करें काम ऐसे सभी हैं जो व्यर्थ,
तमोगुण से पैदा हो ये सब अनर्थ ||१३||

अर्जुन ! बढ़ा हो सतोगुण ही जब,
जो देहधारी मृत्यु को प्राप्त हो तब |
तो पश्चात मरने के जाये वहाँ,
उत्तम कर्म करने वाले जहाँ ||१४||

रजोगुण के बढ़ने पे ही जो मरे,
कर्म करने वालो में वह जन्म ले |
तमोगुण के बढ़ने पर मरता हैं जो,
जन्म नीच योनि में ही उसका हो ||१५||

जो है सात्विक कर्मो में ही लगा,
फल उसका होता हैं निर्मल सदा |
रजोगुण के कर्मो का फल दुःख हो,
कहा फल तमोगुण का ज्ञान को ||१६|

पैदा सतोगुण से हो ज्ञान ही,
रजोगुण से उत्पत्ति हो लोभ की |
प्रमाद और मोह तमोगुण से हो,
उत्पन्न करें यह ही ज्ञान को ||१७||

मिले लोक ऊँचे सतोगुण से ही,
राजस पुरुष तो जन्म लें यहीं |
तमोगुण हैं जिसमे बहुत वह अधम,
निम्न योनियों में सदा लें जन्म ||१८||

बन साक्षी जो है यह देखता,
नहीं कर्ता कोई गुणों की सिवा |
अपने को जाने गुणों से परे,
पा लेता स्वरूप को वह मेरे ||१९||

देह पैदा होती गुणों से ही तो,
इन तीनों से ऊँचा उठता हैं जो |
बुढ़ापे जन्म मौत की दुःखो से,
मुक्त हो के आनंद से वह रहे ||२०||

अर्जुन उवाच
तब अर्जुन ने पूछा बताओ प्रभु !
लक्षण क्या उसके गुणातीत जो |
आचरण होते भला उसके क्या,
गुणातीत भगवन ! वो कैसे हुआ ||२१||

   श्रीभगवानुवाच 
अर्जुन ! गुणातीत ऐसा हैं जो,
प्रकाश,प्रवृत्ति,मोह कुछ भी हो |
लगे इनमें तो द्वेष हो कभी,
हटने से करता इच्छा ही ||२२||

रहता हैं बन कर उदासीन ही,
विचलित हो जो गुणों से कभी |
वर्त रहे गुण जान लेता जो यह,
जमे अपने में डगमगाता वह ||२३||

सुख-दुःख में सम,अपने में जो रहे,
मिट्टी,सोना,पत्थर बराबर जिसे |
प्रिय अप्रिय को जो समझे समान,
बराबर स्तुति निंदा ,हैं धैर्यवान ||२४||

रहे सम मिले चाहे अपमान मान,
वैरी हो या मित्र,समझे समान |
अभिमान हो कर्तापन का कभी,
गुणातीत कहलाता अर्जुन ! वही ||२५||

करता हैं जो भजन मेरा सदा,
किसी और का जो लें आसरा |
तीनों गुणों से वही पार हो,
पुरुष ऐसा प् लेता हैं ब्रह्म को ||२६||

अमृत व् अविनाशी पर ब्रह्म का,
अर्जुन ! हूँ आधार मैं ही सदा |
सनातन धर्म का सहारा हूँ मैं,
सुख शाश्वत भी मुझी से ही हैं ||२७||

तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायांयोगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे गुणत्रयविभागयोगो नाम चतुर्दशोऽध्यायः
हरी   तत्सत !हरी   तत्सत !हरी   तत्सत !

  

No comments:

Post a Comment