Monday, 2 November 2015

गीता पाठ-दसवाँ अध्याय

||श्री कृष्ण कृपा||
''दसवाँ अध्याय''
"विभूतियोग"
पूजय महाराज श्री जी दवारा श्री मदभगवद गीता
जी के दसवाँ अध्याय " विभूतियोग " की  सरल सुबोध पद्यानुवाद व्याखिया
श्री भगवानुवाच
भगवान बोले कि अर्जुन ! तू सुन,
मुझ से ये फिर मेरे हितकर वचन |
मुझे प्यार हैं तुझ से ही इसलिये,
कहता हूँ यह तेरे हित के लिये ||||

उत्पत्ति मेरी जाने कोई,
कि हो देवता या वो हो महर्षि|
सभी देवताओ का कारण हूँ मैं,
महर्षि भी सब मुझी से ही है ||||

अजन्मा अनादि जो जाने मुझे,
महा-ईश्वर सबका माने मुझे |
मनुष्यो में ज्ञानी है अर्जुन ! वही,
नष्ट हो चुके पाप उसके सभी ||||

बुद्धि,ज्ञान,मोह से रहित भाव जो,
क्षमा, सत्य,शम,दम भी मुझसे ही हो |
सुख-दुःख ये,उत्पत्ति और प्रलय भी,
भय और अभय भाव मुझ से सभी ||||

समता,अहिंसा व् संतुष्टि भी,
तप,दान,यश और ये अपयश सभी |
जितने हैं सब भाव जीवो कि ये,
होते हैं पैदा सभी मेरे से ||||

महर्षि सातों व् उन से पहले,
मनु और जो सनकादि चारो हुए |
सभी पैदा संकल्प से मेरे ही,
प्रजा हैं सब जिनसे पैदा हुई ||||

विभूतियाँ जो भी मेरी जान ले,
जो शक्ति मेरे योग की मान ले |
जम जाता है योग में बस वही,
इसमे जरा भर भी संशय नही ||||

यह संसार मुझ से ही पैदा हुआ,
मेरी ही शक्ति से हैं चल रहा |
ऐसा समझ हो की श्रद्धा मग्न,
करे बुद्धि जीवी मेरा ही भजन ||||

मन जिनका मुझ में,मुझी में हैं प्राण,
मिलकर सदा करते मेरा बखान |
मेरे गुणों का ही करके कथन,
संतुष्ट हो करते मुझ में रमन ||||

लगा ध्यान जिनका मुझी में सदा,
करे प्रेम से जो भजन बस मेरा |
देता हूँ उनको मैं वह बुद्धियोग,
मुझको ही पा लेते जिससे वे लोग ||१०||

होती हैं जब उनपे कृपा मेरी,
तो बस जाता हूँ उनके हृदय में ही |
दीपक जला ज्ञान का उनमे तब,
करुँ नस्ट मैं उनका अज्ञान सब ||११||
अर्जुन उवाच
परम  ब्रह्म हो तुम परमधाम हो,
पवित्र परम भी कहे आपको |
अविनाशी दिव्य पुरुष हो तुम्ही,
अनादि अजन्मा सर्वव्यापी  भी ||१२||

कहते हैं सारे ऋषि ऐसा ही,
नारद,असित,व्यास,देवल सभी |
प्रभु ! आप खुद भी तो मेरे लिये,
स्वरूप अपना बता यह रहे ||१३||

केशव ! कहा अपने जो मुझे,
सच मानता हूँ मैं बिल्कुल इसे |
स्वरूप ऐसा मगर आपका,
जाने असुर इसे देवता ||१४||

सब प्राणियों के रचयिता प्रभु !
स्वामी सभी के भी तुम ही तो हो |
पुरुषोंतम हो देवों के देव भी,
अपने को हो जानते आप ही ||१५||

विभूतियाँ जितनी भी हैं आपकी,
शक्ति से जिनकी हैं दुनियाँ टिकी |
सभी शक्तियां दैवी अपनी ही ये,
कह सकते हो आप ही बस इन्हे ||१६||

लगातार चिंतन मैं करते हुए,
योगेश्वर ! कैसे जानू तुम्हे |
अपनाऊ क्या भाव जिससे प्रभु,
चिंतन सदा आपका ही जो हो ||१७||

भगवन ! कहो मुझ से फिर आप अब,
योग और विभूति का विस्तार सब,
सुन आपके ऐसे अमृत वचन,
कभी तृप्त होता नही मेरा मन ||१८||

श्री  भगवानुवाच
तो भगवन कहने लगे ये तभी,
नही अंत इन शक्तियों का मेरी |
कुरुश्रेष्ठ ! फिर भी मैं तेरे लिये,
कहता हूँ ये शक्तियाँ सार में ||१९||

हृद्धय में अर्जुन ! सभी जीवो के,
रहता हूँ मैं आत्मा रूप में |
आदि हूँ मैं ही सभी जीवो का,
अंत और मध्य भी हूँ मैं सदा ||२०||

अदिति के पुत्रो में विष्णु हूँ मैं,
सूर्य हूँ उनमे जो प्रकाशक हैं |
मरीचि समझ मुझ को मरुतों में तू,
नक्षत्रों  में चंद्रमा मैं ही हूँ ||२१||

हूँ मैं ही सब वेदो में वेद साम,
देवों में इंद्र तू मुझ को ही जान |
मन उनमे जितनी भी हैं इंद्रियाँ,
सभी प्राणियों की हूँ मैं मैं चेतना ||२२||

रुद्रों में शंकर मुझे तू समझ,
कुबेर उनमे जो यक्ष और राक्षस |
वसुओं में अग्नि  मेरा रूप हैं,
ऊँचे पहाड़ो में मेरु हूँ मैं ||२३||

जो पुरोहित हैं अर्जुन समझ ऐसा तू,
बृहस्पति उन सबमे मैं ही तो हूँ |
जो सेनापति उनमे हूँ कार्तिकेय,
समुद्र हूँ मैं ही तो जल -आशयों में ||२४||

भृगु उनमे जो भी महर्षि हैं,
हूँ शब्दों में एकाक्षर मैं |
सभी यज्ञो में मैं हूँ यज्ञ जप का,
हिमालय हूँ उनमे जो कायम सदा ||२५||

वृक्षों में पीपल का हूँ मैं वृक्ष,
ऋषियों में नारद मुझे तू समझ |
चित्ररथ उनमे जो गन्धर्व हैं ,
सिद्धो में तो हूँ कपिल सिद्ध मैं ||२६||

घोड़ो में हूँ मैं ही उच्चैःश्रवा,
जो अमृत के मंथन से प्रगट हुआ |
ऐरावत मैं सब हाथियों में ही हूँ,
मनुष्यो में राजा मुझे जान तू ||२७||

हूँ वज्र मैं शास्त्रो में सभी,
गायों में हूँ कामधेनु मैं ही |
मैं संतान उत्पति में हेतु काम,

सर्पो में वासुकि मुझको तू जान ||२८||

मैं हूँ शेष नाग सभी नागो में,
जलवासियो में वरुणदेव मैं |
समझ पितरो में अर्यमा मुझको मुझ को तू,
जो शासन करे उनमे यमराज हूँ ||२९||

सभी राक्षसो  में हूँ प्रह्लाद मैं,
करे गिनती जो उनका हूँ मैं समय |
पशुओं में सिंह तू मुझे ही समझ,
गरुड़ हूँ मैं उनमे जो पक्षी हैं सब ||३०||

शुद्ध करने वालो में वायु हूँ मैं,
'राम' उनमे,शस्त्रधारियों जितने हैं |
जल-जन्तुओं में मगरमच्छ हूँ,
नदियों में गंगा मुझे जान तू ||३१||

सृष्टियां अब तक हैं जितनी हुई,
आदि,मध्य मैं अंत इन सब का ही |
विद्याओ में ब्रह्म विद्या हूँ मैं,
करे जो विवाद उनका हूँ वाद मैं ||३२||

अकार उनमे अक्षर यहाँ जितने हैं,
समासो में हूँ द्वंद्वसमास मैं |
समझ कल का तू मुझे महाकाल,
करता हूँ सब के ही मैं देखभाल ||३३||

मृत्यु हूँ सबका करे नाश जो,
उत्पति भी सब की मुझ से ही हो |
स्त्रियों में श्री वाक् और कीर्ति,
हूँ मेधा,क्षमा,धृति और स्मृति ||३४||

गाने योग्य जो उनमें हूँ वेध साम,
छन्दो में  गायत्री छंद मुझ को जान |
महीनो में मैं ही मार्ग-शीर्ष हूँ,
ऋतुओं में वसंत ऋतु ||३५||

हूँ छलने वालो में मैं ही जुआ,
तेजस्वी का तेज़ मुझ से हुआ |
विजय और निश्चय मुझे जान तू,
सातोगुणियो का सत्व भी मैं हूँ ||३६||

वृष्णि वंश में मैं वासुदेव हूँ,
मैं हूँ पांडवों में धनञ्जय जो तू|
मैं ही व्यास उन में, हैं जितने मुनि,
कवियों में मैं शुक्राचार्य कवि ||३७||

दमन करने वालो के शक्ति हूँ मैं,
विजय चाहे जो उनकी नीति हूँ मैं |
रहस्यों में तू मौन मुझको ही जान,
मैं हूँ ज्ञान उनका जो हैं ज्ञानवान ||३८||

कारण जो जीवो के उत्पति का,
मैं ही हूँ अर्जुन ! वो कारण सदा |
चर या अचर हो कोई प्राणी भी,
बिना मेरे सत्ता किसी के नही ||३९||

नही अन्त मेरी विभूतियों का,
बहुत हैं मेरी और भी शक्तियाँ |
खा तुझसे इनका जो यह विस्तार,
परतंप ! हैं यह तो सिर्फ इनका सार ||४०||

विभूति या शक्ति कही हो अगर,
किसी वस्तु में शोभा नज़र |
कही भी कोई गुण दिखाई जो दे,
जानो उसे मेरे ही तेज़ से ||४१||

बहुत जानने से लाभ क्या,
अर्जुन ! तू सुन सार इन सबका |
एक अंश मेरे में ही तू समझ,
समाया हुआ हैं यह सारा जगत ||४२||

तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायांयोगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विभूतियोगो नाम दशमोऽध्यायः

हरि तत्सत् ! हरि तत्सत् !हरि तत्सत् !

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