Monday, 2 November 2015

गीता पाठ-बारहवाँ अध्याय


|| श्री कृष्ण कृपा ||
''बारहवाँ अध्याय''
"भक्तियोग"
पूजय महाराज श्री जी दवारा श्री मदभगवद गीता
जी के बाहरवें अध्याय " भक्तियोग " की  सरल सुबोध पद्यानुवाद व्याखिया

अर्जुन उवाच 
सगुण रूप में आपके मन लगा,
करे आप की ही जो भक्ति सदा |
जो अविनाशी निर्गुण की पूजा करे,
प्रभु ! कौन उत्तम हैं इन दोनों में ?

श्रीभगवानुवाच 
मुझी में जो अपना लगाते हैं मन,
लगातार भक्ति में मेरी मग्न |
श्रद्धा अचल जिनकी मुझ में बनी,
हैं मत मेरे में श्रेष्ठ योगी वही ||||

अप्रगट जिसका कथन हो कभी,
अचल, अविनाशी,सर्व्यापी भी |
अटल.एकरस,जो मन का विषय,
पूजा करे जो मेरी इस तरह ||||

वश करके अपनी सभी इन्द्रियाँ,
सबमें ही बुद्धि बराबर बना |
लगे रहते हित में सभी जीवों के,
पा लेते अर्जुन ! हैं वे भी मुझे ||||

निराकार में मन लगाते हैं जो,
साधन में उनको बहुत कष्ट हो |
जब तक बना रहता देह अभिमान,
अव्यक्त में जमता मुश्किल ही ध्यान ||||

मुझे सौंप देते सभी जो कर्म,
परायण हो मेरे,ले मेरी शरण |
कही और मन को जाने दे वे,
सदा ध्यान मेरा ही करते रहे ||||

मुझी में हैं मन,लक्ष्य जिनका हूँ मैं,
ऐसे जो अर्जुन ! मेरे भक्त हैं |
संसार- सागर से कर उनको पार,
करता हूँ मैं स्वयं उनका उद्धार ||||

मन अपना अर्जुन ! तू मुझमे लगा,
बुद्धि में निश्चय भी मेरा बना |
तब इसमे संशय तनिक भी नही,
मुझ में ही मिल जायेगा तू तभी ||||

मुझ में ही मन सौंपने को यदि,
काबिल तू खुद को समझता नही |
तो अभ्यास के योग की शरण से,
कर इच्छा पाने की अर्जुन ! मुझे ||||

हो अगर तुझसे अभ्यास भी,
तो मेरे लिए कर्म कर तू सभी |
मेरे लिए कर्म करता हुआ,
तू सिद्धि परम तब भी पा जायेगा ||१०||

कर सके तू अगर इतना भी,
तो ले फिर शरण मेरे ही योग क़ी |
वश करके मन- इन्द्रियाँ अपनी सब
फल छोड़ कर ही तू कर कर्म सब  ||११||

अभ्यास से श्रेष्ठ होता हैं ज्ञान,
मगर श्रेष्ठ इस ज्ञान से भी हैं ध्यान |
समझ ध्यान से बढ़ के फल त्याग को,
शांति बिना देर की इससे हो ||१२||

नही द्वेष जिसको किसी को किसी जीव से,
हैं प्रेमी जो सब पर दया भी करे,
अहंकार ममता जिसको कही,
क्षमाशील,सम रहता सुख-दुःख में ही ||१३||



योगी जो संतुष्ट रहता सदा,
निश्चय है दृढ,वश में खुद को किया |
मन-बुद्धि अर्पण मुझे जिसने की,
प्यारा मुझे भक्त मेरा वही ||१४||

जिससे किसी को कुछ कष्ट हो,
किसी से भी खुद कष्ट लेता जो |
हर्ष,ईर्ष्या,भय उद्वेग हैं,
प्यारा हैं मुझ को मेरा भक्त वह ||१५||

आशा रहित,शुद्ध जो हैं सदा,
उदासीन दुखो से छूटा हुआ |
चतुर कर्तापन का अभिमान हैं,
प्यारा हैं मुझको मेरा भक्त वह ||१६||

हर्षित हो और करे द्वेष जो,
नही शोक और कामना भी हो |
शुभाशुभ फल क़ी जो इच्छा तज़े,
भक्त भक्तिमान ऐसा प्यारा मुझे ||१७||

शत्रु-मित्र दोनों हैं जिसको समान,
बराबर ही समझे जो अपमान-मान |
सर्दी हो गर्मी या सुख-दुःख भी,
आसक्ति जिसकी किसी से नही ||१८||

स्तुति-निंदा में जो बराबर रहे,
मननशील,संतुष्ट हर रूप में |
स्थिर-बुद्धि,ममता घर में जिसे,
भक्त-भक्तिमान ऐसा प्यारा मुझे ||१९||

श्रद्धा-अचल जिसकी मुझ में ही हो,
समझ मुझको सब,ले मेरी शरण जो |
धर्म-रूप अमृत यह सेवन करे,
बहुत प्यारा हैं भक्त ऐसा मुझे ||२०||
    तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायांयोगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे भक्तियोगो नाम द्वादशोऽध्यायः
हरि तत्सत ! हरि तत्सत ! हरि तत्सत!


1 comment:

  1. Guru ji Pranam Gita ashy bash a baht Saral Hai
    Hali Saman asti Hai shan't a was.

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