Monday, 2 November 2015

गीता पाठ-नौवाँ अध्याय


|| श्री कृष्ण कृपा ||
''नौवाँ अध्याय''
"राजविद्याराजगुह्ययोग"
पूजय महाराज श्री जी दवारा श्री मदभगवद गीता
जी के नौवे अध्याय "राजविद्याराजगुह्ययोग" की  सरल सुबोध पद्यानुवाद व्याखिया

 श्री भगवानुवाच
नही दोष दृष्टि किसी में तेरी,
इसीलिए अर्जुन ! मैं अब तुझसे ही,
रहस्य भरा ज्ञान कहता हूँ वो ,
जिसे जान संसार से मुक्त हो ||||

ज्ञान और रहस्य यहाँ जितने भी,
राजा सभी का हैं यह ज्ञान ही |
शुद्ध ,श्रेष्ठ ,फल इसका प्रत्यक्ष है,
धर्मयुक्त अविनाशी ,हैं सहज यह ||||

श्रद्धा नही जिनको इस धर्म में,
परतंप ! पुरुष ऐसे अज्ञान से |
मुझ को पा सकते हैं वे कभी ,
जन्म और मरण में भटकते वही ||||
 
स्वरूप मेरा जो हैं अव्यक्त,
समाया उसी में हैं सारा जगत |
रहते मुझी में ये प्राणी सभी,
रहूँ मैं लेकिन किसी में कभी ||||

मैं हूँ किसी में मुझमे कोई,
मेरे योग का देखो प्रभाव ही |
उत्पति पालन मैं सबका करुँ,
मगर खुद किसी में कभी रहूँ  ||||

सर्वत्र चलती भले ही हवा ,
आकाश में ही वह रहती सदा |
अर्जुन ! समझ ले तू अब वैसे ही,
रहे मेरे भीतर ही प्राणी सभी ||||

हो जाता हैं कल्प का अन्त जब,
तो मुझ में समा जाते प्राणी ये सब |
कल्प के शुरू में फिर वैसे ही,
रचना करुँ उन सभी जीवो की ||||

वश करके प्रकृति अपनी को तब,
रचता हूँ प्राणी ये मैं सब के सब |
विवश हो के हाथो में प्रकृति के,
बारम्बार चक्कर में आते हैं ये ||||

अर्जुन ! मैं ये कर्म करता हुआ,
उदासीन रहता हूँ इनसे सदा |
हैं मुझको आसक्ति इन कर्मो से,
तभी तो नही मुझको ये बांधते ||||

रचती हैं प्रकृति इस जगत को,
शक्ति मगर पीछे मेरी ही हो |
चक्कर में रहता हैं संसार यह,
कभी पैदा होता कभी होता लय ||१०||

धारण करुँ देह मैं इन्सां के जब,
प्रभाव मेरा मुर्ख जाने तब |
समझते मुझे भी वे अपने समान,
आज्ञा पे मेरी नही देते ध्यान ||११||

आशाये सब जिन के होती हैं व्यर्थ,
हैं उनके कर्मो का ही कुछ भी अर्थ |
वृथा ज्ञान वाले हैं अज्ञानी ये,
मोहित हैं आसुरी स्वभाव से ||१२||

सहारा जो ले दैवी स्वभाव का,
महापुरुष जो जान लेते ऐसा |
हूँ कारण अनादि मैं अनश्वर,
करे भजन मेरा अनन्य होकर ||१३||

   दृढ निश्चय जिनका,लग्न भी लगी,
करे कीर्तन जो सदा मेरा ही |
नमस्कार करते जमा मुझ में मन,
लगातार पूजा में मेरी मग्न ||१४||

इक रूप होकर मुझी से कई,
करे ज्ञान यज्ञ से मेरी पूजा ही |
स्वामी-दास का भाव रखकर बहुत,
पूजे मुझे देख चारो तरफ ||१५||


यज्ञ मैं हूँ और उनकी रीतियाँ मैं,
पितरो का अन्न सुब वनस्पतियाँ मैं |
मन्त्र व् अग्नि मुझे जान तू,
घी और हवन की मैं क्रिया भी हूँ ||१६||

मैं माता पिता सारी दुनिया का हूँ,
पितामह और सबका पालन करुँ |
हूँ वेद मैं ऋग्,यजुर् और साम,
शुद्ध जानने योग्य ओंकार नाम ||१७||

गति,भर्ता,स्वामी मैं हूँ साक्षी,
हितैषी,निवास और शरण सबकी भी |
उत्पति प्रलय हूँ सबका आधार,
अविनाशी कारण,जगत का मैं सार ||१८||

सूर्य रूप में अर्जुन ! तपता हूँ मैं,
जल खींचकर वर्षा करता हूँ मैं |
मृत्यु व् अमृत ये हो मुझ से ही,
मुझ से ही सत और असत भाव भी ||१९||

कर्म जो सकामी कहे वेद में,
पापो से शुद्ध सोमरस जो पिये |
पूजे मुझे स्वर्ग की इछा से,
पुण्यो से पाये स्वर्ग भोग वो ||२०||

स्वर्ग लोक में सुख से रहते हैं वो,
लौटे यही जब खत्म पुण्य हो |
जो ले शरण फल इच्छा की कर्मो की,
जनम मरण चक्कर में रहते वही ||२१||

मेरी ही भक्ति में मन को लगा,
जो चिंतन करे बस मेरा ही सदा |
निरन्तर जो मुझ में जमे रहते हैं,
पूरा करुँ योग-क्षेम उनका मैं ||२२||

श्रद्धा में भर जो सकामी पुरुष,
पूजा करे देवताओ के बस |
असल में तो हैं पूजा वह भी मेरी,
मगर बिन विधि हैं यह- अज्ञान ही ||२३||

सभी यज्ञों को ग्रहण मैं ही करुँ,
मालिक मैं ही सारी सृष्टि का हूँ |
ऐसा मेरा तत्व जाने वे,
इसी से पतन उनका होता रहे ||२४||

करे पूजा देवो की देवो को पाये,
पितरो की पूजक तो पितरो को जाये |
मिले भूतो से पूजक उनके सदा,
भक्त मेरे अर्जुन ! मुझे लेते पा ||२५||

पत्ती हो या फूल फल जल ही हो,
मुझे प्रेम से भेंट करता हैं जो |
शुद्ध हृदय से भेट वह भक्त की,
खाता हूँ मैं वह हो प्रगट तभी ||२६|

कर्म जितने भी करता हैं तू कभी,
खाता हैं कुछ या करे हवन ही |
दे दान या जो भी तप ही करे,
अर्जुन ! वह अर्पण तू कर सब मुझे ||२७||

  मुझे सौंप देगा अगर काम सब,
बंधन में कर्मो की आयेगा तब |
शुभ या अशुभ फल हैं कर्मो की जो,
पाये मुझे सब से ही मुक्त हो ||२८||

बराबर हैं सब जीव मेरे लिए,
हैं प्रेमी द्वेषी कोई भी मुझे |
मगर श्रद्धा से भजते मुझको हैं जो,
मैं उनमे हूँ और रहते मुझ में ही वो ||२९||

दुराचार रग रग में जिसकी भरा,
यकदिल हो करता भजन जो मेरा |
अर्जुन ! समझ ले तू साधु उसे,
निश्चय हैं ढृढ़ उसका मेरे लिये ||३०||

हो जाता धर्मात्मा शीघ्र वो,
मिले शांति ऐसी सदा रहती जो |
निश्चित तू यह बात अर्जुन ! समझ,
कभी नष्ट होता मेरा भक्त्त ||३१||

हो शूद्र या स्त्री वैश्य ही,
या हैं जितनी भी योनिया पाप की |
आते हैं ये भी शरण मेरी जब,
गति परम इनकी भी हो जाये तब ||३२||

ऋषि राज ,भक्त और ब्राह्मण भला,
कहना क्या फिर उनके कल्याण का |
अनित्य हैं संसार दुःख से भरा,
पाकर ऐसे तू भजन कर मेरा ||३३||

हो भक्त मेरा लगा मुझ में मन,
तू कर पूजा मेरी मुझे ही नमन |
शरण मेरी ले जब लगे मुझ में यूँ,
पायेगा मुझको अवश्य ही तू ||३४||

तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्री कृष्णार्जुनसंवादे राजविद्याराजगुह्ययोगो नाम नवमोऽध्यायः


हरि तत्सत ! हरि तत्सत ! हरि तत्सत!

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